यह घर मेरा भी है

 

Emotional Indian family moment showing a daughter-in-law receiving love, respect, and acceptance from her husband and mother-in-law.


“तुम्हें कितनी बार समझाऊँ, छाया? हर बात में अपनी मनमानी मत किया करो। आखिर यह तुम्हारा घर नहीं है।”


विवेक ने गुस्से में यह बात कही और कमरे से बाहर निकल गया।


छाया कुछ पल तक वहीं खड़ी रही। उसके हाथ में कपड़े तह करने के लिए उठाया हुआ कुर्ता उसी तरह रुका रह गया।


उसने धीरे से कुर्ता नीचे रखा और पलंग के किनारे बैठ गई।


आँखों में आँसू थे, लेकिन उसने उन्हें बहने नहीं दिया।


छाया के लिए यह बात नई नहीं थी।


विवेक जब भी किसी बात पर नाराज होता, तो बात चाहे कितनी भी छोटी क्यों न हो, अंत में यही कहता—


“यह तुम्हारा घर नहीं है।”


और विवेक की माँ, विमला देवी, तो जैसे इस एक वाक्य को और बड़ा बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ती थीं।


विमला देवी अक्सर छाया की छोटी-सी गलती को भी बड़ा बनाकर कहतीं—


“बेटा, तुम इसे जितना सिर पर चढ़ाओगे, उतना ही यह घर को अपना समझने लगेगी।”


विवेक चुप रहता।


छाया सब सुनती रहती।


वह जवाब दे सकती थी।


बहुत कुछ कह सकती थी।


लेकिन उसे लगता था कि जवाब देने से घर में शांति नहीं आएगी।


इसलिए वह हर बार अपने आँसू पीकर काम में लग जाती।


शादी के बाद जब छाया इस घर में आई थी, तब उसने मन में एक ही बात रखी थी—


“अब यही मेरा घर है।”


उसने अपने मायके की आदतें पीछे छोड़ दी थीं।


अपनी पसंद पीछे छोड़ दी थी।


यहाँ तक कि कई बार अपनी जरूरतों को भी पीछे कर दिया था।


विवेक को कौन-सी सब्जी पसंद है, बच्चों को दूध किस तरह चाहिए, सास की दवाई कब खत्म होने वाली है, ससुर जी को चाय में कितनी चीनी चाहिए, किस रिश्तेदार का जन्मदिन कब है और पड़ोस में किसके घर क्या परेशानी चल रही है—छाया को सब पता रहता था।


घर में कोई चीज खत्म होने से पहले वह खरीद लाती।


किसी को बुखार हो जाए तो डॉक्टर से बात करती।


बच्चों की फीस जमा करवाती।


बिजली का बिल भरती।


राशन की सूची बनाती।


त्योहारों पर सबके कपड़े चुनती।


विवेक की पसंद का खाना बनाती।


और जब विवेक काम से थका हुआ घर लौटता, तो उसके चेहरे से ही समझ जाती कि आज उसे बातचीत चाहिए या थोड़ी शांति।


लेकिन इन सबके बावजूद उसे बार-बार सुनना पड़ता—


“यह तुम्हारा घर नहीं है।”


एक दिन छाया ने बहुत हिम्मत करके विवेक से पूछा—


“विवेक, मैं आपसे एक बात पूछूँ?”


विवेक ने मोबाइल से नजर हटाए बिना कहा—


“पूछो।”


छाया ने धीमे स्वर में कहा—


“जब मैं इस घर की हर जिम्मेदारी को अपनी जिम्मेदारी समझती हूँ, तो क्या यह घर मेरा नहीं हो सकता?”


विवेक ने मोबाइल एक तरफ रखा और कुछ कठोरता से बोला—


“छाया, बात को इतना मत बढ़ाओ। मैंने गुस्से में कह दिया था।”


छाया ने मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा—


“आपने गुस्से में एक बार नहीं कहा। कई बार कहा है।”


विवेक चुप हो गया।


छाया ने आगे कहा—


“मैं यह नहीं कह रही कि घर मेरे नाम कर दीजिए। मैं सिर्फ इतना चाहती हूँ कि जब मैं इस घर के लिए अपना सब कुछ दे रही हूँ, तो मुझे पराया मत कहिए।”


विवेक ने कुछ नहीं कहा।


वह उठकर बाहर चला गया।


छाया फिर अकेली रह गई।


उस रात वह देर तक सो नहीं पाई।


उसके मन में एक ही सवाल घूमता रहा—


“आखिर मेरा घर है कहाँ?”


मायका?


शादी के बाद माँ ने खुद कहा था—


“बेटी, अब ससुराल ही तेरा घर है।”


और ससुराल?


यहाँ तो हर झगड़े के बाद उसे बता दिया जाता था कि यह उसका घर नहीं है।


फिर वह कहाँ जाए?


क्या किसी स्त्री का अपना घर सिर्फ वही होता है, जहाँ उसके नाम पर कागज हों?


या वह घर भी उसका होता है, जिसे वह अपने हाथों, अपने समय और अपने प्रेम से वर्षों तक संभालती है?


छाया के पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं था।


लेकिन उसने शिकायत करना छोड़ दिया।


वह पहले की तरह घर संभालती रही।


कुछ दिनों बाद परिवार की जिंदगी अचानक बदल गई।


पूरे देश में महामारी फैल गई।


लोग घरों में रहने को मजबूर हो गए।


बाहर निकलना मुश्किल हो गया।


स्कूल बंद हो गए।


कोचिंग सेंटर बंद हो गए।


दफ्तर बंद हो गए।


बाजारों में भी पहले जैसी चहल-पहल नहीं रही।


विवेक का काम घर से ही शुरू हो गया।


उसने घर के एक कमरे को अपना ऑफिस बना लिया।


सुबह से लेकर देर तक लैपटॉप सामने खुला रहता।


ऑनलाइन मीटिंग चलती रहती।


विवेक बच्चों से कहता—


“मेरी मीटिंग चल रही है, कोई कमरे में मत आना।”


बच्चे कुछ देर बाहर खेलते, फिर पढ़ाई के लिए छाया के पास बैठ जाते।


छाया का काम अचानक कई गुना बढ़ गया।


बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई करवाना।


उनकी कॉपियाँ देखना।


खाना बनाना।


घर साफ करना।


बुजुर्ग सास-ससुर की दवाइयों का ध्यान रखना।


राशन संभालना।


दूध वाले का हिसाब रखना।


सब्जी वाले को सामान की सूची भेजना।


कामवाली नहीं आ रही थी, इसलिए घर का लगभग पूरा काम छाया को ही करना पड़ रहा था।


फिर भी उसने किसी से शिकायत नहीं की।


एक दिन कामवाली ने फोन करके पूछा—


“छाया दीदी, मेरी बेटी के लिए थोड़े पैसे चाहिए थे। क्या आप दे सकती हैं?”


छाया ने बिना सोचे कहा—


“हाँ, तुम चिंता मत करो। जितने जरूरी हैं, मैं भेज देती हूँ।”


विवेक यह बात पास से सुन रहा था।


उसने पूछा—


“तुमने उसे पैसे क्यों दे दिए?”


छाया ने सहजता से जवाब दिया—


“उसके घर में भी तो परेशानी होगी। अभी काम भी बंद है।”


विवेक ने कुछ नहीं कहा।


अगले दिन दूध वाला फोन करके बोला—


“भाभी जी, पिछले महीने का हिसाब थोड़ा समझ नहीं आ रहा।”


छाया ने हँसते हुए कहा—


“आप चिंता मत कीजिए। मैंने सब लिखकर रखा है। मैं अभी बता देती हूँ।”


विवेक ने फिर देखा।


छाया के पास पूरे घर का हिसाब था।


उसे पता था किसे कितना देना है और किससे कितना लेना है।


उसे यह भी याद था कि ससुर जी की कौन-सी दवा खत्म होने वाली है।


वह दवाई की फोटो खींचकर मेडिकल स्टोर पर भेजती और कहती—


“भैया, यही दवा चाहिए। अगर यही कंपनी नहीं है तो डॉक्टर से पूछकर दूसरी देना।”


विमला देवी अपने कमरे से आवाज लगातीं—


“छाया, मेरी दवाई आई क्या?”


छाया तुरंत जवाब देती—


“हाँ मम्मी जी, आ गई। मैं अभी लेकर आती हूँ।”


कुछ देर बाद ससुर जी आवाज देते—


“बहू, मेरा चश्मा कहाँ रखा है?”


छाया कहती—


“पिताजी, आपने उसे पूजा वाले कमरे में रखा था। मैं अभी लेकर आती हूँ।”


बच्चा आवाज देता—


“मम्मी, मेरी मैथ्स की क्लास शुरू हो गई।”


छाया तुरंत लैपटॉप लेकर उसके पास बैठ जाती।


दूसरा बच्चा कहता—


“मम्मी, मुझे भूख लगी है।”


छाया रसोई की तरफ भागती।


उसी समय विवेक अपने कमरे से आवाज लगाता—


“छाया, मेरी चाय मिल सकती है?”


छाया कुछ पल के लिए रुकती।


फिर मुस्कुराकर कहती—


“हाँ, अभी लाई।”


पूरा घर उससे कुछ न कुछ माँग रहा था।


और छाया सबको देती जा रही थी।


लेकिन किसी ने उससे यह नहीं पूछा—


“छाया, तुम्हें क्या चाहिए?”


एक दिन बच्चों की ऑनलाइन कक्षा चल रही थी।


छाया एक बच्चे की कॉपी देख रही थी।


तभी विवेक की मीटिंग खत्म हुई।


वह बाहर आया और कुछ देर चुपचाप छाया को देखता रहा।


उसने पहली बार ध्यान दिया कि छाया के चेहरे पर थकान साफ दिखाई दे रही थी।


बाल अस्त-व्यस्त थे।


हाथों पर आटे के निशान थे।


आँखों के नीचे हल्की सूजन थी।


लेकिन बच्चों के सामने वह मुस्कुरा रही थी।


विवेक ने पूछा—


“तुमने खाना खाया?”


छाया ने मुस्कुराकर कहा—


“हाँ।”


विवेक ने रसोई में जाकर देखा।


उसकी प्लेट वैसी ही रखी थी।


खाना ठंडा हो चुका था।


वह वापस आया और बोला—


“तुमने तो खाना खाया ही नहीं।”


छाया ने सहजता से कहा—


“आप सब खा लें, फिर मैं खा लूँगी।”


विवेक ने पहली बार महसूस किया कि यह बात वह पिछले कई वर्षों से कितनी बार सुनता आया है।


“आप पहले खा लीजिए।”


“बच्चों को पहले खिला दूँ।”


“मम्मी-पापा की दवाई दे दूँ।”


“आपकी मीटिंग खत्म होने दें।”


“पहले सबका काम हो जाए।”


छाया हमेशा सबसे बाद में आती थी।


लेकिन घर में सबसे ज्यादा वही मौजूद रहती थी।


उसी रात विवेक ने अपनी माँ को छाया के बारे में कहते सुना—


“बहू को अब घर में रहकर भी बहुत आराम मिल रहा होगा। बाहर जाने का काम तो है नहीं।”


विवेक चुप रहा।


उसने माँ की बात का विरोध नहीं किया।


लेकिन उसके मन में कुछ चुभ गया।


उसे याद आया कि पूरे दिन छाया एक पल भी खाली नहीं बैठी थी।


वह बच्चों की पढ़ाई करवा रही थी।


घर का काम कर रही थी।


दवाइयाँ संभाल रही थी।


राशन का हिसाब रख रही थी।


सबकी जरूरतें पूरी कर रही थी।


और वह?


वह सिर्फ अपने ऑफिस के काम में व्यस्त था।


अगले दिन विवेक की ऑनलाइन मीटिंग जल्दी खत्म हो गई।


वह कमरे से बाहर आया तो उसने देखा कि छाया एक साथ तीन काम कर रही थी।


एक हाथ से सब्जी चला रही थी।


दूसरे हाथ से बच्चे को पढ़ा रही थी।


और कंधे पर फोन दबाकर अपनी सास से दवाई के बारे में बात कर रही थी।


विवेक वहीं खड़ा रह गया।


उसके मन में अचानक एक पुरानी बात गूँज उठी—


“यह तुम्हारा घर नहीं है।”


उसे अपने ही शब्द भारी लगने लगे।


उसे लगा जैसे उसने सिर्फ छाया को नहीं, बल्कि उसके वर्षों के समर्पण को भी ठुकराया था।


उसने पहली बार खुद से पूछा—


“अगर यह घर छाया का नहीं है, तो फिर किसका है?”


उसके पिता?


वे दिनभर अपने कमरे में रहते थे।


उसकी माँ?


वे घर की देखभाल करती थीं, लेकिन उम्र के कारण अब अधिक काम नहीं कर पाती थीं।


बच्चे?


वे तो अभी घर की जिम्मेदारी समझने की उम्र में भी नहीं थे।


और वह?


वह तो नौकरी के कारण ज्यादातर समय बाहर रहता था और अब घर से काम करते हुए भी अपने कमरे तक सीमित था।


फिर इस घर को चलाने वाला कौन था?


जवाब बिल्कुल साफ था।


छाया।


विवेक को अपनी पुरानी बातें याद आने लगीं।


जब छाया बीमार होने के बावजूद बच्चों का खाना बनाकर उठी थी।


जब उसके मायके से किसी के बीमार होने की खबर आई थी, फिर भी उसने घर की जिम्मेदारी नहीं छोड़ी थी।


जब सास की तबीयत खराब हुई थी, तब छाया पूरी रात उनके पास बैठी रही थी।


जब उसके अपने जन्मदिन पर भी उसने परिवार के लिए खाना बनाया था।


और बदले में?


उसे क्या मिला?


सिर्फ एक वाक्य—


“यह तुम्हारा घर नहीं है।”


विवेक की आँखें नम हो गईं।


उसी समय उसकी माँ ने उसे आवाज दी—


“विवेक, बहू से कहना मेरी चाय थोड़ी जल्दी बना दे।”


विवेक ने माँ की तरफ देखा और शांत स्वर में कहा—


“माँ, आज चाय मैं बनाता हूँ।”


विमला देवी हैरान होकर बोलीं—


“तुम? तुम चाय बनाओगे?”


विवेक ने कहा—


“हाँ माँ। क्यों नहीं?”


वह रसोई में गया।


छाया ने उसे देखकर पूछा—


“आप यहाँ?”


विवेक ने कहा—


“आज मैं तुम्हारी मदद करूँगा।”


छाया हल्का-सा मुस्कुराई।


उसने कहा—


“आपको ऑफिस का काम नहीं है?”


विवेक ने जवाब दिया—


“काम है, लेकिन घर भी तो है।”


छाया ने उसकी तरफ देखा।


यह वही विवेक था जो कभी कहता था—


“यह तुम्हारा घर नहीं है।”


आज वही कह रहा था—


“घर भी तो है।”


लेकिन छाया ने कुछ नहीं पूछा।


वह चुपचाप अपना काम करती रही।


विवेक ने चाय बनाई।


लेकिन चाय थोड़ी ज्यादा मीठी हो गई।


विमला देवी ने पहला घूँट लेते ही कहा—


“इसमें चीनी कुछ ज्यादा है।”


विवेक मुस्कुराया और बोला—


“माँ, इतने साल छाया ने आपकी चाय कभी खराब नहीं होने दी। आज एक बार मेरी चाय भी पी लीजिए।”


विमला देवी चुप हो गईं।


विवेक ने पहली बार अपनी माँ के सामने छाया के काम की बात की।


उसने कहा—


“माँ, क्या आपने कभी सोचा है कि छाया पूरे दिन कितना काम करती है?”


विमला देवी ने कहा—


“घर का काम ही तो करती है।”


विवेक ने धीरे से पूछा—


“अगर यही काम मैं करूँ तो क्या इसे सिर्फ घर का काम कहूँगा?”


माँ के पास कोई जवाब नहीं था।


कुछ दिनों में घर के सभी लोगों की सोच धीरे-धीरे बदलने लगी।


बच्चों ने भी समझना शुरू कर दिया कि मम्मी कोई मशीन नहीं है।


एक दिन बेटा अपनी ऑनलाइन क्लास खत्म करके बोला—


“मम्मी, आज मैं अपनी किताबें खुद रख दूँगा।”


छाया ने आश्चर्य से पूछा—


“क्यों?”


बेटे ने कहा—


“क्योंकि आप बहुत काम करती हो।”


छाया मुस्कुरा दी।


उसकी आँखों में हल्की नमी आ गई।


लेकिन सबसे बड़ा बदलाव विवेक में आया था।


अब वह छाया से पूछता—


“तुमने खाना खाया?”


“आज तुम्हें आराम चाहिए?”


“बच्चों की पढ़ाई मैं देख लूँ?”


“माँ की दवाई मैं ले आता हूँ।”


“राशन की सूची मुझे दे दो।”


छाया को इन छोटी-छोटी बातों में एक बड़ा बदलाव दिखाई देने लगा था।


लेकिन उसके मन में अभी भी एक डर था।


उसे लगता था कि शायद यह बदलाव कुछ दिनों का है।


शायद परिस्थितियाँ सामान्य होते ही सब पहले जैसा हो जाएगा।


एक दिन दोनों अकेले बैठे थे।


विवेक ने छाया से कहा—


“छाया, मुझे तुमसे कुछ कहना है।”


छाया ने उसकी तरफ देखा।


विवेक ने कहा—


“क्या तुम्हें याद है, मैं अक्सर तुमसे कहता था कि यह तुम्हारा घर नहीं है?”


छाया ने कुछ पल चुप रहकर कहा—


“हाँ, याद है।”


विवेक की आवाज भर्रा गई।


“मैं गलत था।”


छाया चुप रही।


विवेक ने आगे कहा—


“मुझे समझने में बहुत समय लग गया कि घर सिर्फ दीवारों, कमरों और सामान से नहीं बनता। घर उन लोगों से बनता है, जो उसकी चिंता करते हैं।”


छाया की आँखों में आँसू आ गए।


विवेक ने कहा—


“जब सब बाहर थे, तब भी यह घर चलता था। लेकिन जब सब घर के अंदर बंद हो गए, तब मुझे समझ आया कि इसे चलाने वाली असली ताकत कौन है।”


छाया ने धीरे से पूछा—


“कौन?”


विवेक ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—


“तुम।”


छाया कुछ नहीं बोली।


विवेक ने आगे कहा—


“तुमने इस घर को सिर्फ संभाला नहीं है। तुमने इसे अपना समय दिया, अपनी मेहनत दी, अपनी खुशियाँ छोड़ीं और हर रिश्ते को अपना समझकर निभाया। और मैंने तुम्हें बार-बार पराया होने का एहसास कराया।”


छाया की आँखों से आँसू बह निकले।


विवेक ने कहा—


“मुझे माफ कर दो।”


छाया ने आँसू पोंछते हुए कहा—


“माफी की बात नहीं है, विवेक। बस आगे से मुझे इस घर में अपना समझना।”


विवेक ने तुरंत कहा—


“नहीं छाया। अब सिर्फ अपना नहीं, बराबर का समझूँगा।”


इतने में विमला देवी भी कमरे के बाहर आ गईं।


उन्होंने दोनों की बात सुन ली थी।


कुछ पल चुप रहने के बाद उन्होंने छाया से कहा—


“बहू, मुझे भी तुमसे कुछ कहना है।”


छाया उठने लगी तो विमला देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया।


उन्होंने कहा—


“बैठी रह।”


फिर उन्होंने भारी आवाज में कहा—


“मैंने भी तुझे कई बार कहा कि यह घर तेरा नहीं है। मुझे लगता था कि घर की बहू को हमेशा अपनी जगह याद दिलाते रहना चाहिए। लेकिन आज समझ आया कि जिस इंसान ने इस घर की हर छोटी-बड़ी जरूरत को अपनी जरूरत से पहले रखा, उससे ज्यादा अपना इस घर को कौन समझ सकता है?”


छाया की आँखें फिर भर आईं।


विमला देवी ने कहा—


“अगर तू इस घर की नहीं थी, तो इतने साल इस घर को अपना समझकर क्यों संभालती रही?”


छाया के पास कोई जवाब नहीं था।


विमला देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा—


“आज से यह मत सोचना कि तू इस घर की बहू है। तू इस घर की बेटी भी है।”


छाया ने सास के हाथ पकड़ लिए।


उसके आँसू अब दुख के नहीं थे।


उन आँसुओं में वर्षों की थकान के बाद मिली स्वीकृति थी।


कुछ महीनों बाद परिस्थितियाँ धीरे-धीरे सामान्य होने लगीं।


बच्चे फिर स्कूल जाने लगे।


विवेक का ऑफिस भी खुल गया।


लोग अपनी पुरानी जिंदगी की ओर लौटने लगे।


लेकिन इस परिवार के भीतर एक चीज पहले जैसी नहीं रही।


अब घर के काम सिर्फ छाया की जिम्मेदारी नहीं थे।


विवेक बच्चों के काम में हाथ बँटाता।


बच्चे अपनी किताबें खुद संभालते।


ससुर जी अपनी छोटी जरूरतें खुद पूरी करने की कोशिश करते।


विमला देवी भी जब भी छाया को थका हुआ देखतीं, कहतीं—


“बहू, तू बैठ जा। आज सब्जी मैं काट दूँगी।”


छाया मुस्कुराकर कहती—


“मम्मी जी, आप आराम कीजिए।”


विमला देवी जवाब देतीं—


“आराम मैं भी करूँगी और तू भी करेगी।”


घर में पहली बार छाया को यह महसूस होने लगा था कि उसे सिर्फ काम करने वाली सदस्य नहीं समझा जा रहा, बल्कि परिवार का हिस्सा माना जा रहा है।


एक दिन विवेक ऑफिस जाने से पहले छाया के पास आया।


उसने कहा—


“छाया, मैं जा रहा हूँ। शाम को जल्दी आ जाऊँगा।”


छाया ने मुस्कुराकर पूछा—


“क्यों?”


विवेक ने कहा—


“आज बच्चों के साथ तुम्हें बाहर ले जाना है।”


छाया ने हँसते हुए कहा—


“इतने साल बाद आपको याद आया कि मुझे भी कहीं घूमने जाना पसंद है?”


विवेक ने मुस्कुराकर कहा—


“देर से सही, लेकिन अब याद हमेशा रहेगा।”


वह दरवाजे की तरफ बढ़ा।


फिर अचानक वापस आया और बोला—


“एक बात कहूँ?”


छाया ने पूछा—


“क्या?”


विवेक ने मुस्कुराते हुए कहा—


“यह तुम्हारा घर है।”


छाया कुछ पल उसे देखती रही।


फिर उसने धीरे से कहा—


“नहीं विवेक।”


विवेक ने आश्चर्य से पूछा—


“तो?”


छाया ने मुस्कुराकर कहा—


“यह सिर्फ मेरा घर नहीं है। यह हमारा घर है।”


विवेक की आँखों में खुशी उतर आई।


उसने सिर हिलाया और बाहर चला गया।


छाया वहीं खड़ी रही।


उसने पूरे घर को देखा।


वही दीवारें थीं।


वही कमरे थे।


वही रसोई थी।


वही आँगन था।


लेकिन आज उसे सब कुछ अलग लग रहा था।


क्योंकि घर वही था, पर उसमें रहने वाले लोगों की सोच बदल चुकी थी।


छाया ने मन ही मन सोचा—


“शायद घर वह जगह नहीं जहाँ इंसान सिर्फ रहता है। घर वह जगह है जहाँ उसे यह महसूस कराया जाए कि वह अपना है।”


और उस दिन के बाद छाया ने कभी खुद से यह सवाल नहीं पूछा—


“मेरा घर कहाँ है?”


क्योंकि अब उसे जवाब मिल चुका था।


जिस घर को उसने वर्षों तक अपने प्रेम, मेहनत और त्याग से संभाला था, आखिरकार उस घर ने भी उसे अपना कह दिया था।


इस कहानी की सबसे बड़ी सीख यही है कि किसी रिश्ते में किसी इंसान के योगदान को सिर्फ इसलिए छोटा नहीं समझना चाहिए क्योंकि उसके काम की कोई तनख्वाह नहीं होती। घर संभालना केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि रोज किया जाने वाला एक अदृश्य श्रम है। और जिस व्यक्ति का पूरा जीवन परिवार को संभालने में लगा हो, उसे बार-बार “पराया” कहना उसके मन को भीतर से तोड़ सकता है।


घर की असली पहचान उसकी दीवारों से नहीं, उसमें रहने वाले लोगों के व्यवहार से होती है।


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