बालकनी के उस पार एक अपना था

 

Elderly Indian man and woman sharing a quiet emotional moment from opposite apartment balconies surrounded by beautiful plants.

रघुनाथ जी की उम्र सड़सठ वर्ष थी।


जीवन के इतने वर्षों में उन्होंने बहुत कुछ देखा था—माता-पिता का जाना, बच्चों का बड़ा होना, नौकरी से विदाई और आखिर में अपनी पत्नी सविता का हमेशा के लिए उनसे दूर चले जाना।


सविता के जाने के बाद उनका घर अचानक बहुत बड़ा लगने लगा था।


वही दीवारें थीं, वही सामान था, वही आंगन था, लेकिन घर में अब वह आवाज नहीं थी जो हर छोटी-बड़ी बात पर उनसे कुछ न कुछ कहती रहती थी।


रघुनाथ जी अक्सर कुर्सी पर बैठे अपनी पत्नी की तस्वीर देखते और धीमे से कहते,

“सविता, तुमने तो कहा था कि मैं तुमसे पहले जाऊंगा। फिर मुझे अकेला छोड़कर खुद कैसे चली गई?”


तस्वीर हमेशा की तरह चुप रहती।


कुछ महीनों तक रघुनाथ जी ने अकेले ही रहने की कोशिश की, लेकिन उम्र के साथ अकेलापन सहना कठिन होता जा रहा था।


उनका बेटा निखिल शहर में नौकरी करता था। उसने कई बार पिता से अपने साथ रहने के लिए कहा था।


एक दिन निखिल ने फोन पर कहा,

“पापा, अब आप मेरे साथ ही रहिए। आपका अकेले गांव में रहना मुझे ठीक नहीं लगता।”


रघुनाथ जी ने कुछ देर चुप रहने के बाद कहा,

“बेटा, तुम्हारा अपना परिवार है। मैं वहां जाकर तुम्हारे लिए परेशानी नहीं बनना चाहता।”


निखिल ने प्यार से जवाब दिया,

“आप मेरे पिता हैं, परेशानी नहीं। घर में आपकी जरूरत है।”


रघुनाथ जी बेटे की बात टाल नहीं सके।


कुछ दिनों बाद वे अपना छोटा-सा सामान लेकर बेटे के शहर वाले फ्लैट में आ गए।


निखिल की पत्नी पूजा ने भी उनका स्वागत किया।


पूजा ने मुस्कुराकर कहा,

“पिताजी, आपने बिल्कुल चिंता नहीं करनी है। आपको घर में किसी चीज की कमी नहीं होने देंगे।”


रघुनाथ जी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

“बेटी, मुझे चीजों की कमी नहीं है। बस किसी से दो बातें करने वाला मिल जाए, वही बहुत है।”


पूजा ने सिर हिलाया और बोली,

“आपको यहां मन लग जाएगा।”


निखिल उन्हें उनके कमरे में लेकर गया।


कमरे से जुड़ी एक बड़ी बालकनी थी। बालकनी में एक आरामदायक कुर्सी और छोटी-सी मेज रखी थी।


निखिल ने कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए कहा,

“पापा, जब मन करे यहां बैठिएगा। अखबार पढ़िए, चाय पीजिए और बाहर का नजारा देखिए। आपका मन लगा रहेगा।”


रघुनाथ जी ने सामने देखते हुए कहा,

“हां बेटा, कोशिश करूंगा।”


निखिल ने पिता के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा,

“आपको कोशिश नहीं करनी है पापा, आपको खुश रहना है।”


रघुनाथ जी मुस्कुरा दिए।


लेकिन खुश रहना इतना आसान नहीं था।


निखिल और पूजा दोनों नौकरी करते थे। वे सुबह घर से निकल जाते और देर से लौटते।


निखिल का छोटा बेटा युवान भी स्कूल और पढ़ाई में व्यस्त रहता।


रघुनाथ जी से प्यार सभी करते थे, लेकिन प्यार और साथ में बहुत फर्क होता है।


घर में लोग उनके अपने थे, फिर भी दिन का बड़ा हिस्सा उनके लिए खामोश रहता।


वे कभी अखबार पढ़ते, कभी टीवी चलाते, कभी पुरानी तस्वीरें देखते और कभी बिना किसी कारण बालकनी में जाकर बैठ जाते।


बालकनी से सामने कई फ्लैट दिखाई देते थे।


एक फ्लैट की बालकनी काफी समय से खाली पड़ी थी।


वहां न कोई पौधा था, न कोई कुर्सी, न कोई कपड़ा।


बस बंद खिड़की और सूनी बालकनी।


रघुनाथ जी अक्सर उस तरफ देखते रहते।


उन्हें पता नहीं क्यों उस खाली बालकनी में अपना अकेलापन दिखाई देता था।


एक दिन उस फ्लैट का दरवाजा खुला।


कुछ लोग सामान लेकर अंदर आते-जाते दिखाई दिए।


रघुनाथ जी ने अखबार नीचे रख दिया।


कुछ देर बाद एक महिला बालकनी में आई।


उसकी उम्र लगभग साठ-पैंसठ वर्ष रही होगी।


बालों में सफेदी थी, चेहरे पर उम्र की हल्की रेखाएं थीं, लेकिन आंखों में एक अजीब-सी शांति थी।


उसके साथ एक युवती थी, जो शायद उसकी बहू या घर में काम करने वाली महिला थी।


महिला ने बालकनी को ध्यान से देखा।


फिर उसने कहा,

“यहां दो बड़े गमले रख देना। और उस कोने में तुलसी का पौधा लगा देना।”


उस युवती ने पूछा,

“मांजी, यहां कुर्सी भी रख दूं?”


महिला ने मुस्कुराकर कहा,

“हां, एक आराम वाली कुर्सी और उसके पास छोटी मेज भी।”


अगले कुछ दिनों में खाली बालकनी बदलने लगी।


गमले आ गए।


तुलसी आ गई।


मनी प्लांट की बेल दीवार पर चढ़ने लगी।


छोटे-छोटे फूलों के पौधे रख दिए गए।


एक आरामदायक कुर्सी भी आ गई।


रघुनाथ जी अपनी बालकनी से यह सब देखते रहे।


उन्हें उस महिला की मेहनत अच्छी लगती थी।


एक दिन दोनों की नजरें अचानक मिल गईं।


महिला ने हल्का-सा सिर झुकाकर अभिवादन किया।


रघुनाथ जी ने भी मुस्कुराकर सिर हिला दिया।


बस, यहीं से उनके बीच एक ऐसा रिश्ता शुरू हुआ जिसके लिए किसी परिचय की जरूरत नहीं थी।


अगले दिन महिला बालकनी में पौधों को पानी दे रही थी।


रघुनाथ जी ने उसे देखकर हाथ जोड़कर नमस्ते किया।


महिला ने भी हाथ जोड़ दिए।


कभी वह पौधों की पत्तियां साफ करती, तो रघुनाथ जी दूर से देखते रहते।


कभी रघुनाथ जी अखबार पढ़ते हुए उसकी तरफ देखते और महिला मुस्कुराकर सिर हिला देती।


दोनों के बीच एक शब्द भी नहीं बोला जाता था।


फिर भी दोनों को लगता था कि कोई उन्हें देख रहा है।


किसी को उनके होने का एहसास है।


उस महिला का नाम सुधा था।


सुधा अकेली रहती थी।


उसका बेटा दूसरे शहर में नौकरी करता था और उसकी पोती अक्सर छुट्टियों में उसके पास आती थी।


एक दिन सुधा अपनी छोटी पोती परी को बालकनी में लेकर आई।


परी ने सामने रघुनाथ जी को देखा और अपनी दादी से कुछ कहा।


सुधा ने मुस्कुराकर रघुनाथ जी की तरफ इशारा किया और परी से कहा,

“बेटा, सामने दादाजी को नमस्ते करो।”


परी ने हाथ जोड़कर कहा,

“नमस्ते दादाजी।”


रघुनाथ जी की आंखें चमक उठीं।


उन्होंने दूर से हाथ उठाकर कहा,

“नमस्ते बेटा।”


उस दिन बहुत समय बाद रघुनाथ जी के चेहरे पर ऐसी मुस्कान आई थी जो भीतर तक पहुंची थी।


अगले दिन परी फिर बालकनी में आई।


उसने रघुनाथ जी को देखकर हाथ हिलाया।


रघुनाथ जी ने भी हाथ हिलाया।


धीरे-धीरे यह रोज का हिस्सा बन गया।


रघुनाथ जी अखबार लेकर बालकनी में बैठते तो सबसे पहले सामने देखते।


अगर सुधा वहां होती, तो उन्हें अच्छा लगता।


अगर वह नहीं होती, तो वे कुछ देर इंतजार करते।


सुधा भी बालकनी में आते ही पहले सामने देखती।


अगर रघुनाथ जी कुर्सी पर बैठे दिखाई देते, तो वह मुस्कुरा देती।


एक दिन रघुनाथ जी ने अखबार में कोई मजेदार खबर पढ़ी।


वे खुद ही मुस्कुराने लगे।


सुधा ने दूर से उनके चेहरे की तरफ देखा और हाथ से पूछा,

“क्या हुआ?”


रघुनाथ जी ने अखबार उठाकर इशारा किया।


सुधा हंस पड़ी।


दोनों के बीच फिर भी कोई आवाज नहीं हुई।


लेकिन उस हंसी ने दूरी कम कर दी।


अब कभी रघुनाथ जी बालकनी में चाय लेकर आते तो सुधा अपनी चाय का कप उठाकर उनकी तरफ दिखाती।


रघुनाथ जी भी अपना कप उठा देते।


मानो दोनों कह रहे हों—


“चलिए, आज भी साथ बैठते हैं।”


रघुनाथ जी को धीरे-धीरे बालकनी का इंतजार रहने लगा।


एक दिन उन्होंने अपनी पुरानी डायरी में लिखा—


“आज मैंने किसी से बात नहीं की, फिर भी ऐसा लगा जैसे किसी ने मुझसे बहुत बातें की हैं।”


अगले पन्ने पर उन्होंने लिखा—


“अजीब है यह रिश्ता। आवाज नहीं है, नाम का पता नहीं, फिर भी इंतजार रहता है।”


उनकी पत्नी सविता की तस्वीर सामने रखी थी।


रघुनाथ जी ने तस्वीर देखकर कहा,

“सविता, तुम्हारे बाद पहली बार किसी की मौजूदगी अच्छी लगने लगी है। चिंता मत करना, मैं तुम्हें भूला नहीं हूं।”


कुछ दिनों बाद सुधा की बालकनी में एक नया पौधा आया।


रघुनाथ जी ने इशारे से पूछा कि यह कौन-सा पौधा है।


सुधा ने कुछ समझाने की कोशिश की।


दूरी के कारण रघुनाथ जी समझ नहीं पाए।


उन्होंने दोनों हाथ फैलाकर कहा,

“समझ नहीं आया।”


सुधा जोर से हंस पड़ी।


फिर उसने कागज पर कुछ लिखकर ऊपर उठाया।


उस पर लिखा था—


“चंपा।”


रघुनाथ जी ने पढ़कर अंगूठा ऊपर किया।


उन्होंने अपनी तरफ से इशारे में पूछा,

“नाम अच्छा है।”


सुधा ने सिर हिलाकर कहा,

“बहुत।”


अब दोनों के बीच छोटे-छोटे इशारों का एक संसार बन गया था।


रघुनाथ जी कभी पूछते कि पौधों में फूल क्यों नहीं आए।


सुधा हाथ से इशारा करती कि थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा।


सुधा कभी पूछती कि रघुनाथ जी आज बालकनी में क्यों नहीं आए।


रघुनाथ जी हाथ से पेट पकड़कर बताते कि खाना खाकर आराम कर रहे थे।


यह रिश्ता इतना शांत था कि उसमें कोई अपेक्षा नहीं थी।


न मिलने की शिकायत।


न फोन का इंतजार।


न कोई वादा।


बस सामने वाली बालकनी में एक इंसान का होना ही दूसरे के लिए काफी था।


एक दिन युवान ने अपने दादा से पूछा,

“दादाजी, आप सामने वाली आंटी को रोज क्यों देखते हैं?”


रघुनाथ जी थोड़ा मुस्कुराए और बोले,

“क्योंकि बेटा, कभी-कभी किसी से बात करने के लिए शब्दों की जरूरत नहीं होती।”


युवान ने मासूमियत से पूछा,

“तो आप दोनों दोस्त हैं?”


रघुनाथ जी कुछ पल चुप रहे।


फिर उन्होंने कहा,

“शायद।”


युवान हंसकर बोला,

“दोस्त हैं तो उनसे बात क्यों नहीं करते?”


रघुनाथ जी ने सामने की बालकनी की तरफ देखते हुए कहा,

“हर रिश्ता बोलकर बनाया जाए, यह जरूरी नहीं।”


समय बीतता गया।


सुधा के पौधे बड़े होते गए।


चंपा के पौधे में पहली बार फूल आया।


सुधा ने वह फूल तोड़कर अपनी बालकनी की रेलिंग पर रखा और रघुनाथ जी को इशारे से दिखाया।


रघुनाथ जी ने खुशी से ताली बजाई।


अगले दिन उन्होंने अपने बेटे से कहा,

“निखिल, बाजार से चंपा का छोटा पौधा मिल जाए तो मेरे लिए ले आना।”


निखिल ने पूछा,

“पापा, आपको अचानक पौधे का शौक कैसे हो गया?”


रघुनाथ जी मुस्कुराए और बोले,

“बस बेटा, सामने किसी ने बालकनी को सुंदर बना दिया है। अपनी बालकनी भी थोड़ी सुंदर कर लेता हूं।”


कुछ ही दिनों में रघुनाथ जी की बालकनी में भी दो-तीन गमले आ गए।


अब सामने की बालकनी और उनकी बालकनी दोनों पहले से ज्यादा जीवंत लगती थीं।


एक दिन सुधा ने रघुनाथ जी की बालकनी में नए पौधे देखे।


उसने दोनों हाथ जोड़कर खुशी जताई।


रघुनाथ जी ने मुस्कुराकर सिर झुका दिया।


उन्हें लगा जैसे सुधा ने उनके घर में नहीं, उनके जीवन में पौधे लगाए हैं।


लेकिन जिंदगी हमेशा एक जैसी नहीं रहती।


एक दिन रघुनाथ जी बालकनी में आए।


सामने सुधा नहीं थी।


उन्होंने सोचा, शायद किसी काम में व्यस्त होगी।


अगले दिन भी सुधा नहीं आई।


तीसरे दिन भी उसकी कुर्सी खाली थी।


रघुनाथ जी की नजर बार-बार उसी कुर्सी पर जा रही थी।


उन्होंने अपने आप से कहा,

“शायद परी के पास गई होगी।”


कुछ दिन और बीत गए।


बालकनी में रखे पौधों की मिट्टी सूखने लगी।


मनी प्लांट की कुछ पत्तियां झुक गईं।


तुलसी भी मुरझाने लगी।


रघुनाथ जी के मन में चिंता बढ़ने लगी।


उन्होंने निखिल से पूछा,

“बेटा, सामने वाले फ्लैट में रहने वाली महिला के बारे में तुम्हें कुछ पता है?”


निखिल ने कहा,

“कौन, पापा?”


रघुनाथ जी ने सामने की बालकनी की तरफ इशारा किया और बोले,

“वही जो वहां रहती हैं।”


निखिल ने कहा,

“नहीं पापा, मुझे तो उनके बारे में कुछ पता नहीं।”


रघुनाथ जी ने सिर हिला दिया।


वे चाहते थे कि किसी तरह पता करें, लेकिन अचानक किसी के निजी जीवन में पूछताछ करना उन्हें ठीक नहीं लगा।


फिर एक दिन सामने का दरवाजा खुला।


वही युवती दिखाई दी जो कभी सुधा के साथ आई थी।


वह सीधे बालकनी में गई और सूखे पौधों को देखने लगी।


रघुनाथ जी बेचैन होकर अपनी बालकनी की रेलिंग तक आए।


उन्होंने हाथ से पूछा,

“सुधा जी कहां हैं?”


युवती ने पहले उनकी तरफ देखा।


फिर उसकी आंखें झुक गईं।


उसने हाथ जोड़कर अपनी छाती पर रखा और धीरे से सिर झुका दिया।


रघुनाथ जी कुछ समझ नहीं पाए।


उन्होंने फिर पूछा,

“क्या हुआ?”


युवती ने अपनी आंखों की तरफ इशारा किया और फिर दोनों हाथ ऊपर करके भगवान की ओर संकेत किया।


रघुनाथ जी के हाथ वहीं रुक गए।


उनके चेहरे का रंग बदल गया।


उन्होंने बहुत धीमे से पूछा,

“वो... चली गईं?”


युवती ने सिर हिला दिया।


रघुनाथ जी की आंखें भर आईं।


उन्होंने सामने पड़ी उस खाली कुर्सी को देखा।


वही कुर्सी जिस पर सुधा बैठकर पौधों को देखा करती थी।


वही छोटी मेज।


वही तुलसी।


वही मनी प्लांट।


लेकिन सुधा नहीं थी।


रघुनाथ जी अपनी कुर्सी पर बैठ गए।


उन्होंने अखबार खोला, लेकिन शब्द दिखाई नहीं दे रहे थे।


उनकी आंखों के सामने बार-बार सुधा का चेहरा आ रहा था।


उन्हें याद आया—


चाय का कप उठाकर मुस्कुराना।


परी से नमस्ते करवाना।


चंपा का पहला फूल दिखाना।


और वह छोटा-सा कागज, जिस पर उसने लिखा था—


“चंपा।”


रघुनाथ जी ने अपनी आंखें बंद कर लीं।


धीरे से बोले,

“आपने अपना नाम तो बता दिया था सुधा जी... लेकिन यह नहीं बताया कि इतनी जल्दी चली जाएंगी।”


उनकी आवाज कांप रही थी।


उस दिन पहली बार उन्हें समझ आया कि कुछ रिश्ते हमारे जीवन में बिना दस्तक दिए आते हैं और जाते समय दरवाजा भी नहीं खटखटाते।


अगले दिन रघुनाथ जी बाजार गए।


उन्होंने एक छोटा-सा चंपा का पौधा खरीदा।


निखिल ने पौधा देखकर पूछा,

“पापा, यह किसलिए?”


रघुनाथ जी ने कहा,

“सामने वाली बालकनी में चंपा का पौधा था। वह सूख गया है।”


निखिल ने पूछा,

“आप वहां पौधा लगाएंगे?”


रघुनाथ जी ने कुछ पल चुप रहकर कहा,

“नहीं बेटा। मैं अपनी बालकनी में लगाऊंगा।”


उन्होंने चंपा का पौधा अपनी बालकनी के उस कोने में रख दिया जहां से वह सामने वाली बालकनी को साफ देख सकते थे।


हर दिन वह पौधे में पानी देते।


कुछ महीनों बाद उसमें पहला फूल आया।


रघुनाथ जी ने उस फूल को हाथ में लिया।


फिर सामने की खाली बालकनी की तरफ देखा।


वहां अब भी सुधा की कुर्सी रखी थी।


उन्होंने फूल को अपनी मेज पर रखा और धीमे से कहा,


“देखिए सुधा जी... चंपा खिल गया।”


सामने कोई नहीं था।


फिर भी रघुनाथ जी मुस्कुरा दिए।


उस दिन उन्होंने अपनी डायरी में लिखा—


“कुछ लोग हमारे जीवन में रहने के लिए नहीं आते। वे सिर्फ हमें यह याद दिलाने आते हैं कि हम अभी भी किसी के लिए मायने रखते हैं।”


इसके बाद रघुनाथ जी ने अकेलेपन से लड़ना सीख लिया।


उन्होंने बालकनी में और पौधे लगाए।


युवान के साथ समय बिताने लगे।


पड़ोस के बुजुर्गों से मिलने लगे।


कभी-कभी नीचे पार्क में जाकर लोगों से बातें करते।


उनके बेटे निखिल ने एक दिन पिता को मुस्कुराते हुए देखा तो पूछा,

“पापा, अब आपका मन लगने लगा है?”


रघुनाथ जी ने बेटे की तरफ देखकर कहा,

“हां बेटा।”


निखिल ने खुशी से पूछा,

“कैसे?”


रघुनाथ जी ने अपनी बालकनी में खिले चंपा के फूल की तरफ देखते हुए कहा,


“किसी ने मुझे सिखाया था कि सूनी जगह को सिर्फ पौधों से नहीं, अपने होने से भी भरा जा सकता है।”


निखिल कुछ समझा नहीं, लेकिन उसने पिता के कंधे पर हाथ रख दिया।


रघुनाथ जी ने सामने देखा।


सुधा की बालकनी अब भी शांत थी।


लेकिन उन्हें अब वह वीरान नहीं लगती थी।


उन्हें लगता था जैसे उस खाली कुर्सी पर आज भी कोई बैठा है।


कभी पौधों को पानी दे रहा है।


कभी चाय पी रहा है।


कभी दूर से हाथ जोड़कर कह रहा है—


“नमस्ते।”


रघुनाथ जी भी हर बार उसी दिशा में देखकर धीरे से सिर झुका देते।


क्योंकि कुछ रिश्ते खत्म नहीं होते।


वे बस बातों से निकलकर यादों में चले जाते हैं।


और कुछ लोग हमारे पास रहकर नहीं,

हमारे भीतर रहकर जिंदगी भर साथ चलते हैं।



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