जिसे अनाथ समझा... वही सबसे अपना निकला
"जिस अनाथ लड़के ने एक बुज़ुर्ग की सेवा की... अंतिम साँस से पहले उस बुज़ुर्ग ने जो राज़ बताया, उसने पूरे परिवार की नींद उड़ा दी।"
सर्दियों की धुंध अभी पूरी तरह छँटी भी नहीं थी।
सुबह के पाँच बजे थे।
शहर के पुराने रेलवे स्टेशन के बाहर चाय वालों की आवाज़ें गूँज रही थीं।
"गरमा-गरम चाय... अदरक वाली चाय..."
उसी भीड़ के बीच एक दुबला-पतला लड़का फटी हुई जैकेट पहने लकड़ी की बेंच पर बैठा था।
उसका नाम अर्जुन था।
उम्र मुश्किल से तेईस साल।
चेहरे पर थकान, आँखों में नींद से ज़्यादा ज़िंदगी की मार दिखाई देती थी।
उसके पास एक छोटा-सा बैग था, जिसमें दो जोड़ी कपड़े, कुछ पुराने कागज़ और उसकी माँ की धुंधली तस्वीर रखी थी।
उस तस्वीर को वह हर सुबह देखता था।
आज भी उसने तस्वीर निकाली।
धीरे से मुस्कुराया।
"माँ... आज फिर नया शहर है। देखते हैं यहाँ किस्मत क्या लिखती है।"
पास बैठा चाय वाला उसे कई मिनट से देख रहा था।
वह एक कुल्हड़ लेकर उसके सामने आया।
"लो बेटा... चाय पी लो।"
अर्जुन ने जेब टटोली।
सिर्फ़ बाइस रुपए बचे थे।
"नहीं काका... पैसे बचाने हैं।"
बूढ़ा चाय वाला मुस्कुराया।
"अरे... ये मेरी तरफ़ से है। सुबह-सुबह किसी की दुआ मिल जाए तो दिन अच्छा जाता है।"
अर्जुन ने पहली बार मुस्कुराकर चाय ली।
गर्म चाय की भाप के साथ उसकी आँखें भी भर आईं।
माँ को गए दस साल हो चुके थे।
पिता कौन थे...
वह आज तक नहीं जानता था।
माँ हमेशा कहती थीं...
"बेटा... इंसान की पहचान उसके कर्म से होती है... नाम से नहीं।"
माँ के जाने के बाद वह अनाथालय पहुँचा।
अठारह साल का होते ही वहाँ से भी निकलना पड़ा।
तब से कभी होटल में बर्तन धोए...
कभी गोदाम में सामान उठाया...
कभी रिक्शा चलाया...
जहाँ दो वक्त की रोटी मिली...
वहीं कुछ दिन गुज़ार दिए।
लेकिन एक बात उसने कभी नहीं छोड़ी—
ईमानदारी।
दोपहर तक वह काम ढूँढ़ते-ढूँढ़ते थक चुका था।
अर्जुन सबसे पहले एक फैक्ट्री पहुँचा।
मालिक ने पूछा, "पहले कहीं काम किया है?"
"नहीं साहब... लेकिन सीख जाऊँगा।"
मालिक ने सिर हिलाया।
"हमें अनुभवी आदमी चाहिए। तुम जा सकते हो।"
फिर वह एक गोदाम गया।
मुंशी ने वही सवाल पूछा।
"अनुभव है?"
"नहीं।"
"तो काम नहीं मिलेगा।"
दिन भर लगभग हर जगह उसे यही जवाब मिला।
शाम होने लगी।
तभी उसकी नज़र बिजली के खंभे पर लगे एक छोटे से कागज़ पर पड़ी।
उस पर लिखा था—
"एक बुज़ुर्ग व्यक्ति की देखभाल के लिए भरोसेमंद लड़के की आवश्यकता। रहने और खाने की व्यवस्था।"
नीचे पता लिखा था।
अर्जुन बिना देर किए वहाँ पहुँच गया।
शहर के किनारे एक बहुत पुरानी हवेली थी।
ऊँची दीवारें।
जंग लगा लोहे का गेट।
अंदर बड़ा-सा आँगन।
लेकिन पूरे घर में अजीब सा सन्नाटा पसरा था।
गेट खोलने वाला लगभग पचपन साल का आदमी था।
साफ़ सफ़ेद कुर्ता-पायजामा।
चेहरे पर घमंड साफ़ दिखाई देता था।
गेट पर खड़े आदमी ने पूछा, "क्या चाहिए?"
अर्जुन ने विनम्रता से कहा, "जी... नौकरी के लिए आया हूँ।"
उसने ऊपर से नीचे तक अर्जुन को देखा।
वह बोला, "तुम?"
अर्जुन ने सिर झुकाकर जवाब दिया, "जी।"
आदमी ने अगला सवाल किया, "पहले कहीं काम किया है?"
अर्जुन बोला, "जी... बुज़ुर्ग की सेवा का नहीं, लेकिन मेहनत कोई भी कर सकता हूँ। जो काम मिलेगा, पूरी ईमानदारी से करूँगा।"
वह आदमी कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला—
"अंदर आओ।"
ड्रॉइंग रूम इतना बड़ा था कि अर्जुन ने शायद पहली बार ऐसा घर देखा था।
दीवारों पर महँगी पेंटिंग्स।
बड़े झूमर।
लकड़ी का भारी फर्नीचर।
लेकिन उस पूरे घर में हँसी नहीं थी।
बस ख़ामोशी।
थोड़ी देर बाद सीढ़ियों से एक महिला उतरी।
लगभग पचास साल की।
महँगी साड़ी।
चेहरे पर बनावटी मुस्कान।
नीचे खड़े आदमी ने सम्मान से कहा,
"मैडम, यही लड़का नौकरी के लिए आया है।"
महिला ने अर्जुन को सिर से पाँव तक गौर से देखा। उनकी नज़र जैसे उसके कपड़ों और चेहरे को परख रही थी।
फिर उन्होंने ठंडी आवाज़ में पूछा,
"तुम्हारा नाम क्या है?"
अर्जुन ने विनम्रता से जवाब दिया,
"जी... अर्जुन।"
महिला ने अगला सवाल किया,
"घर में कौन-कौन है? कोई अपना?"
अर्जुन कुछ सेकंड चुप रहा।
फिर बोला...
"जी... अब मेरा कोई अपना नहीं है। मैं अकेला हूँ।"
महिला ने एक-दूसरे की तरफ़ देखकर धीमे से कहा...
महिला ने एक पल के लिए अपने पास खड़े आदमी की ओर देखा।
दोनों की नज़रें मिलीं।
महिला ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा,
"अच्छा है..."
अर्जुन ने वह बात सुन ली...
लेकिन कुछ समझ नहीं पाया।
उसे ऊपर दूसरी मंज़िल पर ले जाया गया।
कमरे का दरवाज़ा खुला।
अंदर दवाइयों की हल्की गंध फैली हुई थी।
खिड़की के पास व्हीलचेयर पर लगभग अस्सी साल के एक बुज़ुर्ग बैठे थे।
सफ़ेद बाल।
कमज़ोर शरीर।
लेकिन आँखें...
अभी भी किसी शेर जैसी तेज़ थीं।
उन्होंने अर्जुन को देखते ही चश्मा उतार दिया।
काफ़ी देर तक उसे देखते रहे।
जैसे किसी पुराने चेहरे को याद करने की कोशिश कर रहे हों।
फिर धीमे से बोले—
"बेटा... तुम्हारा नाम क्या बताया?"
अर्जुन ने आदर से हाथ जोड़ते हुए जवाब दिया,
"जी... अर्जुन।"
बुज़ुर्ग ने गहरी साँस ली। उनकी नज़रें अर्जुन के चेहरे पर ही टिकी रहीं। फिर उन्होंने दूसरा सवाल किया,
"और... तुम्हारी माँ का नाम?"
अर्जुन की आवाज़ धीमी पड़ गई।
"जी... सरोज।"
बस...
इतना सुनते ही बूढ़े के हाथ काँप गए।
व्हीलचेयर की पकड़ कस गई।
आँखें अचानक भर आईं।
उन्होंने तुरंत चेहरा दूसरी तरफ़ घुमा लिया।
कमरे में कुछ सेकंड तक अजीब सी ख़ामोशी छाई रही।
नीचे खड़ा आदमी बोला—
"बाबूजी... यही लड़का रहेगा आपकी देखभाल के लिए।"
बूढ़े ने बिना अर्जुन की तरफ़ देखे सिर्फ़ इतना कहा—
"रख लो..."
जब सब लोग बाहर निकल गए...
तब बूढ़े ने पहली बार अर्जुन को अपने पास बुलाया।
"बेटा..."
अर्जुन पास आया।
"जी?"
बूढ़े ने काँपते हाथ से उसका चेहरा छू लिया।
फिर मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोले—
"पता नहीं क्यों...
तुझे देखते ही ऐसा लगा...
जैसे ज़िंदगी बहुत पुरानी कोई याद वापस ले आई हो..."
अर्जुन कुछ समझ नहीं पाया।
लेकिन उसके मन में पहली बार उस बूढ़े के लिए अपनापन जागा।
उसे नहीं पता था...
कि इस हवेली की दीवारों में सिर्फ़ सन्नाटा नहीं...
बल्कि एक ऐसा राज़ भी कैद था...
जो अगले कुछ महीनों में सिर्फ़ इस परिवार की नहीं...
बल्कि उसकी अपनी पूरी ज़िंदगी बदलने वाला था।
अर्जुन को उस हवेली में आए हुए आज पंद्रह दिन हो चुके थे।
पहले-पहल उसे लगता था कि यह सिर्फ़ एक नौकरी है। सुबह उठो, बाबूजी को दवा दो, खाना खिलाओ, कपड़े बदलवाओ और रात तक उनकी देखभाल करो।
लेकिन धीरे-धीरे उसे महसूस होने लगा कि इस हवेली की दीवारें जितनी ऊँची थीं, उतनी ही गहरी उदासी भी उनमें कैद थी।
बाबूजी का नाम देवेंद्र प्रताप सिंह था।
शहर के बड़े उद्योगपतियों में कभी उनका नाम लिया जाता था।
लेकिन अब उनका ज़्यादातर समय व्हीलचेयर और दवाइयों के बीच ही गुजरता था।
उनके दो बेटे थे—विक्रम और निखिल।
दोनों उसी हवेली में रहते थे।
महँगी गाड़ियाँ, बड़े कारोबार, नौकर-चाकर... किसी चीज़ की कमी नहीं थी।
लेकिन एक चीज़ की कमी अर्जुन रोज़ देखता था—
अपने पिता के लिए समय।
सुबह दोनों बेटे बिना बाबूजी के कमरे में झाँके ऑफिस निकल जाते।
शाम को लौटते तो सीधे अपने कमरों में चले जाते।
अगर कभी आते भी, तो सिर्फ़ एक सवाल पूछते—
"पापा, दवा समय पर ली?"
और जवाब सुने बिना ही मोबाइल देखने लगते।
लेकिन अर्जुन...
वह बाबूजी के साथ बैठकर घंटों बातें करता।
कभी अख़बार पढ़कर सुनाता।
कभी पुराने गाने मोबाइल पर चला देता।
कभी उन्हें व्हीलचेयर पर बिठाकर बगीचे तक ले जाता।
धीरे-धीरे बाबूजी की आँखों में फिर से चमक लौटने लगी।
एक दिन बगीचे में बैठे-बैठे उन्होंने पूछा—
"अर्जुन... तूने शादी क्यों नहीं की?"
अर्जुन मुस्कुरा दिया।
"पहले अपना घर तो हो बाबूजी... फिर किसी की ज़िम्मेदारी उठाऊँगा।"
बाबूजी कुछ देर उसे देखते रहे।
फिर बोले—
"घर... ईंट और पत्थर से नहीं बनता बेटा... अपनापन हो तो झोपड़ी भी महल लगती है।"
अर्जुन चुप हो गया।
उसे अपनी माँ की याद आ गई।
धीरे-धीरे बाबूजी उसे अपने अतीत की बातें बताने लगे।
कैसे उन्होंने एक छोटी दुकान से कारोबार शुरू किया।
कैसे उनकी पत्नी सावित्री हर मुश्किल में उनके साथ खड़ी रहीं।
और कैसे सावित्री के जाने के बाद पूरा घर होते हुए भी वे अकेले रह गए।
एक शाम बाबूजी ने अलमारी से एक पुराना डिब्बा निकलवाया।
उसमें कई पुरानी तस्वीरें थीं।
अचानक अर्जुन की नज़र एक तस्वीर पर जाकर ठहर गई।
तस्वीर में एक जवान महिला थी...
जिसका चेहरा उसकी माँ सरोज से बहुत मिलता था।
अर्जुन चौंक गया।
"बाबूजी... ये कौन हैं?"
देवेंद्र प्रताप सिंह के हाथ काँप उठे।
उन्होंने तस्वीर झट से वापस रख दी।
"पुरानी बातें हैं बेटा..."
और बात बदल दी।
लेकिन उस दिन के बाद अर्जुन ने कई बार महसूस किया—
जब भी वह अपनी माँ का ज़िक्र करता...
बाबूजी की आँखें भर आतीं।
इधर घर के बाकी लोगों को अर्जुन का बाबूजी के करीब आना अच्छा नहीं लग रहा था।
एक रात अर्जुन पानी लेने नीचे आया।
ड्रॉइंग रूम की लाइट जल रही थी।
अंदर विक्रम और निखिल बात कर रहे थे।
विक्रम बोला—
"पापा इस लड़के पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा करने लगे हैं।"
निखिल ने धीरे से कहा—
"मुझे भी ठीक नहीं लग रहा। कहीं वसीयत बदल दी तो?"
"इसलिए कह रहा हूँ... इस अर्जुन पर नज़र रखो।"
अर्जुन के कदम वहीं रुक गए।
उसने पहली बार महसूस किया...
इस घर में डर किसी बीमारी का नहीं...
जायदाद का है।
कुछ दिन बाद बाबूजी की तबीयत अचानक बिगड़ गई।
रात के दो बजे साँस लेने में दिक्कत होने लगी।
अर्जुन घबराया नहीं।
उसने तुरंत डॉक्टर को बुलाया।
ऑक्सीजन लगवाई।
पूरी रात उनके सिरहाने बैठा रहा।
सुबह डॉक्टर बाहर निकले।
उन्होंने दोनों बेटों से कहा—
"इनका अब ज़्यादा ध्यान रखिए... समय बहुत कम है।"
यह सुनते ही पूरे घर में सन्नाटा छा गया।
लेकिन अर्जुन ने देखा...
दोनों भाइयों की पहली नज़र बाबूजी पर नहीं...
एक-दूसरे पर गई।
उस रात बाबूजी ने अर्जुन को अकेले कमरे में बुलाया।
दरवाज़ा बंद करने को कहा।
कमरे में सिर्फ़ टेबल लैंप की हल्की रोशनी थी।
देवेंद्र प्रताप सिंह ने काँपते हाथ से अर्जुन का हाथ पकड़ा।
उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी।
"अर्जुन..."
"जी बाबूजी।"
"अब शायद मेरे पास ज़्यादा समय नहीं है..."
अर्जुन की आँखें भर आईं।
"ऐसा मत कहिए।"
बाबूजी हल्का-सा मुस्कुराए।
"हर इंसान को एक दिन जाना होता है..."
उन्होंने तकिए के नीचे से एक पुरानी चाबी निकाली।
"मेरी अलमारी के सबसे नीचे वाले खाने में... एक लाल रंग की डायरी रखी है..."
"उसमें मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच लिखा है..."
अर्जुन हैरान होकर उन्हें देखने लगा।
बाबूजी की आँखों से आँसू बह निकले।
"मैंने पूरी ज़िंदगी एक बहुत बड़ा पाप किया है..."
"और अब उस पाप का बोझ लेकर मरना नहीं चाहता..."
अर्जुन का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
"बाबूजी... कैसा पाप?"
देवेंद्र प्रताप सिंह ने काँपते हुए उसके हाथ को कसकर पकड़ लिया।
और फुसफुसाए—
"जिसे दुनिया आज तक अनाथ समझती रही..."
"वह सच में अनाथ नहीं है..."
अर्जुन की साँस जैसे रुक गई।
बाबूजी ने काँपते होंठों से अगला वाक्य कहना शुरू किया...
"तुम्हारी माँ सरोज..."
कमरे में घड़ी की टिक-टिक साफ़ सुनाई दे रही थी।
देवेंद्र प्रताप सिंह की साँसें तेज़ चल रही थीं।
उन्होंने अर्जुन का हाथ कसकर पकड़ लिया।
आँखों से आँसू बह निकले।
बहुत मुश्किल से उन्होंने कहा—
"तुम्हारी माँ... सरोज... मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी गलती नहीं... बल्कि सबसे बड़ा अधूरा सच थीं।"
अर्जुन कुछ समझ नहीं पाया।
"बाबूजी... मैं कुछ समझा नहीं।"
देवेंद्र प्रताप सिंह ने गहरी साँस ली।
"आज से लगभग पच्चीस साल पहले... मैं इस शहर में नया-नया उद्योग शुरू कर रहा था। तुम्हारी माँ मेरी कंपनी में काम करती थीं। बहुत ईमानदार... बहुत स्वाभिमानी लड़की थीं।"
"एक दिन मेरे छोटे भाई ने कंपनी के पैसों की चोरी की। मैंने बिना जाँच किए... तुम्हारी माँ पर शक कर लिया।"
"मैंने सबके सामने उनका अपमान किया... नौकरी से निकाल दिया।"
अर्जुन की आँखें फैल गईं।
देवेंद्र जी की आवाज़ काँप रही थी।
"कुछ दिनों बाद असली चोर पकड़ में आ गया। मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ। मैं सरोज से माफ़ी माँगने गया... लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।"
"उन्होंने शहर छोड़ दिया था।"
"मैंने बहुत खोजा... सालों तक खोजा... लेकिन वे नहीं मिलीं।"
अर्जुन की मुट्ठियाँ भींच गईं।
"फिर...?"
देवेंद्र जी रो पड़े।
"करीब दस साल बाद पता चला... उन्होंने अकेले ही तुम्हें पाला। किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया। बीमारी में भी किसी से मदद नहीं माँगी... और एक दिन दुनिया छोड़ गईं।"
अर्जुन के गालों पर आँसू बहने लगे।
"अगर उस दिन मैं उन पर भरोसा कर लेता... तो शायद उनकी ज़िंदगी ऐसी नहीं होती।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
देवेंद्र जी ने तकिए के नीचे रखी लाल डायरी अर्जुन की ओर बढ़ाई।
"इस डायरी में सब लिखा है... मेरी गलती... मेरी तलाश... और मेरी माफ़ी।"
"मैं चाहता हूँ... मेरे जाने के बाद मेरे बेटे भी इसे पढ़ें... ताकि उन्हें समझ आए कि इंसान पैसा खोकर अमीर रह सकता है... लेकिन विश्वास खोकर नहीं।"
इतना कहते-कहते उनकी साँस उखड़ने लगी।
अर्जुन घबरा गया।
"डॉक्टर...!"
वह बाहर भागा।
पूरा परिवार कमरे में आ गया।
डॉक्टर भी पहुँच गए।
लेकिन कुछ ही मिनटों बाद...
डॉक्टर ने धीरे से चादर उनके चेहरे तक खींच दी।
"इनका निधन हो गया..."
पूरा घर रोने लगा।
अर्जुन वहीं ज़मीन पर बैठ गया।
जिस इंसान ने उसे पहली बार अपनापन दिया था...
वह हमेशा के लिए चला गया।
तेरहवीं के बाद परिवार का वकील आया।
सब लोग ड्रॉइंग रूम में बैठे थे।
वकील ने कहा—
"देवेंद्र प्रताप सिंह जी ने एक पत्र और एक डायरी छोड़ रखी है।"
सबकी नज़रें वकील पर टिक गईं।
पत्र पढ़ा जाने लगा—
> "मेरे बेटों...
मैंने ज़िंदगी में एक बहुत बड़ी गलती की।
एक निर्दोष स्त्री का सम्मान छीन लिया।
उसका बेटा अर्जुन आज मेरी सेवा कर रहा है।
उसने मुझे कभी दोष नहीं दिया, जबकि सबसे ज़्यादा अधिकार उसी का था।
यदि इस घर में किसी ने बिना स्वार्थ के मेरा साथ निभाया है... तो वह अर्जुन है।
मेरी इच्छा है कि उसे कभी इस घर से पराया मत समझना।
उसे कोई संपत्ति नहीं दे रहा हूँ... क्योंकि मैं जानता हूँ कि वह सेवा की कीमत कभी नहीं लेगा।
लेकिन तुम दोनों बेटे... उससे इंसानियत सीख लेना।
यही मेरी अंतिम इच्छा है।"
कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया।
फिर वकील ने लाल डायरी खोली।
उसमें सरोज के बारे में हर सच लिखा था।
देवेंद्र जी की गलती...
उनका पछतावा...
उन्हें खोजने की कोशिश...
सब कुछ।
विक्रम और निखिल के सिर शर्म से झुक गए।
उन्हें पहली बार एहसास हुआ...
जिस लड़के को वे सिर्फ़ नौकर समझते रहे...
वह उनके पिता के अधूरे पश्चाताप का सबसे बड़ा सहारा था।
अगली सुबह अर्जुन अपना छोटा-सा बैग लेकर बाहर निकलने लगा।
विक्रम दौड़कर आया।
"अर्जुन... मत जाओ।"
निखिल भी उसके सामने आ गया।
"भैया... हमें माफ़ कर दो। हम तुम्हें समझ ही नहीं पाए।"
अर्जुन हल्का-सा मुस्कुराया।
"आप लोगों से कोई शिकायत नहीं है।"
"लेकिन अब मुझे चलना चाहिए।"
विक्रम ने पूछा—
"कम से कम ये घर अपना समझकर तो रहो।"
अर्जुन ने बरामदे में रखी देवेंद्र जी की खाली व्हीलचेयर की ओर देखा।
फिर धीरे से बोला—
"घर दीवारों से नहीं बनता... यादों से बनता है।"
"मेरी यादें अब यहाँ हमेशा रहेंगी... लेकिन मेरा रास्ता आगे है।"
उसने लाल डायरी सावधानी से बैग में रखी।
और बाहर निकल गया।
कुछ महीने बाद...
उसी शहर में अर्जुन ने एक छोटा-सा वृद्ध सेवा केंद्र शुरू किया।
नाम रखा—
"सरोज सदन"
जहाँ उन बुज़ुर्गों को रखा जाता था...
जिन्हें उनके अपने बच्चे अकेला छोड़ चुके थे।
उद्घाटन के दिन विक्रम और निखिल भी आए।
विक्रम की आँखें भर आईं। वह अर्जुन के सामने आकर रुक गया। कुछ पल तक कुछ बोल ही नहीं पाया। फिर उसने दोनों हाथ जोड़ दिए।
"अर्जुन... हमें माफ़ कर दो। हमने तुम्हें कभी समझा ही नहीं। तुम नौकर नहीं, पापा के सबसे अपने इंसान निकले।"
निखिल भी आगे आया। उसकी आवाज़ काँप रही थी।
"अगर हो सके... तो कभी हमें भी अपना समझ लेना।"
अर्जुन ने तुरंत दोनों के जुड़े हुए हाथ पकड़ लिए और नीचे कर दिए।
"हाथ जोड़कर मुझे छोटा मत कीजिए। बाबूजी ने मुझे सेवा करना सिखाया था, हिसाब रखना नहीं।"
इतना सुनते ही तीनों की आँखें नम हो गईं और अर्जुन ने दोनों भाइयों को गले लगा लिया।
उसकी आँखों के सामने माँ का मुस्कुराता चेहरा तैर गया।
उसे लगा...
शायद आज कहीं ऊपर बैठी माँ भी कह रही हों—
"देखा बेटा... इंसान की पहचान उसके जन्म से नहीं... उसके कर्म से होती है।"
और बरामदे में रखी सरोज की तस्वीर के सामने जलता छोटा-सा दीपक हवा के बिना भी हल्का-सा काँप उठा...
मानो किसी अधूरे रिश्ते को आखिरकार शांति मिल गई हो।

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