अनजान बुज़ुर्ग की बेटी बनी रागिनी
कुछ रिश्ते जीवन में अचानक मिलते हैं, लेकिन धीरे-धीरे इतने गहरे हो जाते हैं कि उनके बिना जीने की कल्पना भी मुश्किल लगने लगती है। ऐसे रिश्तों को न खून की जरूरत होती है और न किसी वादे की। उन्हें सिर्फ सच्चे मन और निस्वार्थ प्रेम की जरूरत होती है।
रागिनी की शादी को आठ साल हो चुके थे। उसके पति निखिल एक निजी कंपनी में अच्छे पद पर काम करते थे। उनका एक छोटा-सा सुंदर घर था और छह साल की बेटी परी भी थी। रागिनी खुद एक स्कूल में अध्यापिका थी। बाहर से देखने पर उसकी जिंदगी में किसी चीज की कमी नहीं थी।
लेकिन रागिनी के मन में हमेशा एक बात खटकती रहती थी। उसे लगता था कि इंसान सिर्फ अपने परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाने के लिए ही नहीं जन्म लेता। जीवन में कुछ ऐसा भी होना चाहिए, जिससे किसी दूसरे की जिंदगी बेहतर बन सके।
उसके पिता का देहांत तब हो गया था, जब वह कॉलेज में पढ़ती थी। पिता के जाने के बाद उसने उनकी कमी को बहुत गहराई से महसूस किया था। शायद यही वजह थी कि वह किसी बुज़ुर्ग को अकेला या परेशान देखती, तो उसका मन बेचैन हो उठता।
एक दिन स्कूल से लौटते समय उसकी नजर सामने वाली गली के एक पुराने मकान पर पड़ी। उस मकान के बाहर एक बुज़ुर्ग व्यक्ति लकड़ी की कुर्सी पर बैठे थे। उनके चेहरे पर उम्र की झुर्रियाँ थीं और आँखों में एक अजीब-सी उदासी।
रागिनी ने पहले भी उन्हें कई बार देखा था, लेकिन कभी बातचीत नहीं हुई थी।
उसने अपनी पड़ोसन कमला जी से उनके बारे में पूछा।
रागिनी ने कहा, "आंटी, सामने वाले घर में जो बुज़ुर्ग रहते हैं, वे कौन हैं? मैंने उन्हें कई बार अकेले बैठे देखा है।"
कमला जी ने जवाब दिया, "बेटी, उनका नाम हरिशंकर त्रिपाठी है। पहले सरकारी कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर थे। पत्नी का देहांत पाँच साल पहले हो गया था। एक बेटा और एक बेटी हैं, लेकिन दोनों अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त रहते हैं।"
रागिनी ने आश्चर्य से पूछा, "क्या उनके बच्चे उनसे मिलने नहीं आते?"
कमला जी ने गहरी साँस लेते हुए कहा, "कभी-कभार फोन कर लेते हैं। बेटा दूसरे शहर में रहता है और बेटी विदेश में। पैसे की कमी नहीं है, लेकिन इस उम्र में इंसान को पैसों से ज्यादा अपनेपन की जरूरत होती है।"
यह सुनकर रागिनी का मन भारी हो गया।
उसने उसी दिन तय कर लिया कि वह किसी न किसी बहाने उन बुज़ुर्ग से बातचीत जरूर करेगी।
अगले दिन रागिनी ने अपने घर में हलवा बनाया और एक कटोरी लेकर उनके घर पहुँच गई।
दरवाजा खटखटाने पर अंदर से आवाज आई।
"कौन है?"
रागिनी ने मुस्कुराकर कहा, "नमस्ते अंकल जी, मैं सामने वाले घर में रहती हूँ। मेरा नाम रागिनी है। आपके लिए थोड़ा हलवा लेकर आई हूँ।"
बुज़ुर्ग ने दरवाजा खोला और गंभीर आवाज में बोले, "बेटी, इसकी क्या जरूरत थी? मैं अपना खाना खुद बना लेता हूँ।"
रागिनी ने सहजता से कहा, "मुझे पता है अंकल जी, लेकिन कभी-कभी पड़ोसियों के साथ भी कुछ बाँट लेना चाहिए। आप इसे रख लीजिए।"
उन्होंने कटोरी ले ली, मगर चेहरे पर कोई खास खुशी नहीं दिखाई।
"ठीक है बेटी, धन्यवाद।"
रागिनी वापस लौट आई।
उसे लगा कि शायद वे ज्यादा बातचीत पसंद नहीं करते।
लेकिन उसने कोशिश करना नहीं छोड़ा।
कुछ दिनों बाद वह फिर उनके घर गई। इस बार उसके हाथ में एक किताब थी।
रागिनी ने पूछा, "अंकल जी, क्या आपको हिंदी साहित्य पढ़ना पसंद है?"
हरिशंकर जी की आँखों में पहली बार चमक दिखाई दी।
उन्होंने कहा, "पसंद ही नहीं, बेटी, कभी यही मेरी पूरी दुनिया हुआ करती थी। वर्षों तक बच्चों को साहित्य पढ़ाया है।"
रागिनी ने उत्सुकता से पूछा, "तो फिर आप मुझे भी कोई अच्छी किताब सुझाइए। मुझे भी पढ़ने का बहुत शौक है।"
हरिशंकर जी ने उसे अपने कमरे में रखी पुरानी किताबों की अलमारी दिखाई।
उन्होंने एक किताब निकालते हुए कहा, "इसे पढ़ना। इसमें जीवन को समझने की बहुत अच्छी बातें हैं।"
उस दिन दोनों के बीच काफी देर तक बातचीत हुई।
रागिनी को महसूस हुआ कि हरिशंकर जी के पास अनुभवों का बहुत बड़ा खजाना है, बस सुनने वाला कोई नहीं है।
धीरे-धीरे रागिनी का उनके घर आना-जाना बढ़ने लगा।
कभी वह उनके लिए खाना ले जाती, कभी उनकी दवाइयाँ व्यवस्थित कर देती और कभी उनके साथ बैठकर पुरानी किताबों की बातें करती।
एक दिन जब रागिनी उनके घर पहुँची, तो उसने देखा कि हरिशंकर जी अपनी पत्नी की तस्वीर के सामने बैठे थे।
उनकी आँखें नम थीं।
रागिनी ने धीरे से पूछा, "अंकल जी, क्या हुआ? आपकी तबीयत ठीक है?"
हरिशंकर जी ने तस्वीर की ओर देखते हुए कहा, "बेटी, आज हमारी शादी की सालगिरह है। पहले इस दिन घर में बहुत रौनक रहती थी। तुम्हारी आंटी सुबह से तरह-तरह के पकवान बनाती थीं। बच्चे घर में शोर मचाते थे। अब देखो, सब कुछ है, लेकिन कोई नहीं है।"
रागिनी कुछ पल चुप रही।
फिर उसने उनके पास बैठकर कहा, "अंकल जी, अगर आप बुरा न मानें तो आज मैं आपके साथ खाना खाऊँगी। परी भी आपके पास आएगी। आप अकेले नहीं हैं।"
हरिशंकर जी ने उसकी तरफ देखा।
उनकी आँखों में पहली बार एक पिता जैसी ममता दिखाई दी।
उन्होंने भावुक होकर कहा, "बेटी, तुम्हारे आने से इस घर में फिर से किसी के कदमों की आवाज सुनाई देने लगी है।"
रागिनी ने मुस्कुराकर उनका हाथ पकड़ लिया।
"अंकल जी, आप मुझे अपनी बेटी समझ सकते हैं।"
यह सुनते ही हरिशंकर जी की आँखों से आँसू बहने लगे।
उन्होंने कहा, "काश, मेरी अपनी बेटी भी कभी मुझसे इसी तरह बात कर पाती।"
रागिनी ने उनके आँसू पोंछते हुए कहा, "आप चिंता मत कीजिए। अब आपको हर बात अकेले नहीं सहनी पड़ेगी।"
उस दिन रागिनी ने उनके साथ खाना खाया। परी ने उन्हें अपने स्कूल की कविताएँ सुनाईं और घर लौटते समय उन्हें गले लगाकर बोली, "दादाजी, मैं फिर आऊँगी।"
हरिशंकर जी काफी देर तक दरवाजे पर खड़े उन्हें जाते देखते रहे।
उनके चेहरे पर कई महीनों बाद सच्ची मुस्कान थी।
लेकिन इस रिश्ते की गहराई बढ़ने के साथ एक नई परेशानी भी सामने आने लगी।
एक दिन हरिशंकर जी का बेटा अमित अचानक उनसे मिलने आया। उसके साथ उसकी पत्नी भी थी।
अमित ने घर में रागिनी की तस्वीरें और परी के बनाए हुए कुछ चित्र देखे। वह हैरान रह गया।
उसने अपने पिता से पूछा, "पापा, ये सब किसके चित्र हैं? और ये रागिनी कौन है, जिसका नाम आपने कई जगह लिख रखा है?"
हरिशंकर जी ने शांत स्वर में जवाब दिया, "वह मेरी पड़ोस में रहने वाली बेटी है। बहुत ध्यान रखती है मेरा।"
अमित ने तुरंत कहा, "पापा, आपको किसी अजनबी पर इतना भरोसा नहीं करना चाहिए। आजकल लोग सीधे-सादे बुज़ुर्गों का फायदा उठाते हैं।"
हरिशंकर जी का चेहरा गंभीर हो गया।
उन्होंने कहा, "अमित, जिस समय मुझे तुम्हारी जरूरत थी, उस समय तुमने महीनों तक मेरी खबर नहीं ली। इस लड़की ने बिना किसी स्वार्थ के मेरा हाथ पकड़ा है।"
अमित ने झुंझलाकर कहा, "पापा, हम काम में व्यस्त रहते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि हमें आपकी परवाह नहीं है।"
हरिशंकर जी ने धीमी आवाज में कहा, "परवाह सिर्फ कहने से नहीं होती, बेटा। कभी-कभी किसी के पास बैठना भी जरूरी होता है।"
अमित कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, "आपको कोई परेशानी हो तो हमें बताइए। किसी पड़ोसी को इतना करीब लाने की जरूरत नहीं है।"
इतना कहकर वह चला गया।
रागिनी को जब इस बातचीत के बारे में पता चला, तो उसने हरिशंकर जी से कहा, "अंकल जी, अमित भैया आपके बेटे हैं। उन्हें आपकी चिंता है। आपको उनसे नाराज नहीं होना चाहिए।"
हरिशंकर जी ने मुस्कुराकर कहा, "बेटी, मैं अपने बच्चों से नाराज नहीं हूँ। बस अब उनसे कोई उम्मीद नहीं रखता।"
रागिनी ने उन्हें समझाया कि रिश्तों को एक मौका और देना चाहिए।
उसने खुद अमित को फोन करके बात की और आग्रह किया कि वे समय निकालकर अपने पिता से मिलने आया करें।
लेकिन अमित ने उसकी बात को गंभीरता से नहीं लिया।
कुछ महीने और बीत गए।
हरिशंकर जी की तबीयत अब पहले से कमजोर रहने लगी थी। रागिनी उन्हें नियमित डॉक्टर के पास ले जाती और उनकी जाँच करवाती रहती।
एक दिन डॉक्टर ने बताया कि उनके हृदय की स्थिति ठीक नहीं है। उन्हें विशेष देखभाल की जरूरत है।
रागिनी ने यह बात निखिल को बताई।
निखिल ने कहा, "रागिनी, तुम उनकी बहुत सेवा करती हो, लेकिन अपनी सेहत और घर का भी ध्यान रखना। अगर जरूरत पड़े तो किसी देखभाल करने वाले व्यक्ति का इंतजाम कर देते हैं।"
रागिनी ने जवाब दिया, "मैं समझती हूँ, लेकिन उन्हें सिर्फ किसी कर्मचारी की जरूरत नहीं है। उन्हें अपनेपन की जरूरत है।"
निखिल ने उसका हाथ पकड़कर कहा, "मैं तुम्हें रोक नहीं रहा। बस इतना चाहता हूँ कि तुम खुद को इतना थका मत लिया करो।"
रागिनी मुस्कुराई।
"तुम्हारा साथ है न, तो मैं सब संभाल लूँगी।"
लेकिन उसे नहीं पता था कि आने वाले दिनों में उसकी जिंदगी का सबसे भावुक अध्याय शुरू होने वाला है।
एक दिन हरिशंकर जी ने उसे अपने कमरे में बुलाया।
उनके हाथ में एक पुरानी फाइल थी।
उन्होंने कहा, "बेटी, मैं तुमसे कुछ जरूरी बात करना चाहता हूँ।"
रागिनी उनके पास बैठ गई।
"जी अंकल जी, बताइए।"
हरिशंकर जी ने फाइल उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा, "मेरे पास शहर के बाहर थोड़ी जमीन है। इसके अलावा बैंक में कुछ बचत भी है। मैं चाहता हूँ कि मेरे जाने के बाद इस संपत्ति का एक हिस्सा उन बच्चों की पढ़ाई के लिए इस्तेमाल हो, जिनके माता-पिता उन्हें अच्छी शिक्षा नहीं दे सकते।"
रागिनी ने तुरंत कहा, "अंकल जी, आप ऐसी बातें क्यों कर रहे हैं? अभी आपको बहुत स्वस्थ रहना है।"
हरिशंकर जी मुस्कुराए।
"मौत से कोई नहीं बच सकता, बेटी। लेकिन इंसान के जाने के बाद भी उसके अच्छे काम जिंदा रह सकते हैं।"
उन्होंने आगे कहा, "मैंने जीवनभर किताबें पढ़ाईं। अब चाहता हूँ कि मेरी बची हुई संपत्ति से कुछ बच्चों का भविष्य सँवर जाए।"
रागिनी ने उनकी इच्छा का सम्मान किया, लेकिन संपत्ति से जुड़ी किसी भी जिम्मेदारी को लेने से साफ मना कर दिया।
उसने कहा, "आपकी इच्छा बहुत अच्छी है। मैं आपकी मदद जरूर करूँगी, लेकिन आपका पैसा और संपत्ति आपके बच्चों का अधिकार है। किसी भी फैसले से पहले कानूनी सलाह लेकर सब कुछ साफ-साफ तय कीजिए।"
हरिशंकर जी ने संतोष से सिर हिलाया।
"इसीलिए तो तुम मुझे अपनी बेटी जैसी लगती हो। तुमने कभी मुझसे कुछ माँगा ही नहीं।"
उन्होंने एक वकील से संपर्क किया और अपनी इच्छा के अनुसार कानूनी वसीयत तैयार करवाई। उसमें बच्चों की सहमति और वैधानिक अधिकारों को ध्यान में रखते हुए शिक्षा सहायता के लिए एक निश्चित राशि अलग रखने की व्यवस्था की गई।
रागिनी को इन बातों की ज्यादा जानकारी नहीं थी। वह तो बस चाहती थी कि हरिशंकर जी स्वस्थ रहें।
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
एक रात अचानक हरिशंकर जी को सीने में तेज दर्द हुआ।
उन्होंने काँपते हाथों से फोन उठाया और रागिनी को कॉल किया।
"बेटी... रागिनी..."
आवाज सुनते ही रागिनी घबरा गई।
उसने पूछा, "अंकल जी, क्या हुआ? आप ठीक तो हैं?"
हरिशंकर जी ने दर्द से कराहते हुए कहा, "बेटी, जल्दी आ जाओ। सीने में बहुत दर्द हो रहा है।"
रागिनी ने तुरंत निखिल को आवाज लगाई।
दोनों बिना देर किए उनके घर पहुँचे और उन्हें अस्पताल ले गए।
डॉक्टरों ने उन्हें तुरंत आईसीयू में भर्ती कर लिया।
रागिनी अस्पताल के बाहर बैठकर लगातार प्रार्थना कर रही थी।
कुछ समय बाद डॉक्टर बाहर आए।
उन्होंने गंभीर स्वर में कहा, "मरीज की हालत नाजुक है। हमने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है। आप उनके परिवार वालों को भी बुला लीजिए।"
रागिनी ने तुरंत अमित को फोन किया।
"भैया, पिताजी अस्पताल में हैं। उनकी हालत बहुत गंभीर है। आप जल्दी आ जाइए।"
अमित ने घबराकर पूछा, "क्या हुआ पापा को?"
रागिनी ने रोते हुए कहा, "अभी कुछ मत पूछिए। बस जल्दी पहुँचिए।"
करीब दो घंटे बाद अमित अस्पताल पहुँचा।
वह सीधे डॉक्टर के पास गया और फिर अपने पिता के कमरे में दाखिल हुआ।
हरिशंकर जी की साँसें धीमी हो रही थीं।
उन्होंने बेटे को देखकर आँखें खोलीं।
"अमित... आ गए तुम?"
अमित ने उनका हाथ पकड़ लिया।
"हाँ पापा, मैं आ गया हूँ। आप ठीक हो जाइए। मैं अब आपको अकेला नहीं छोड़ूँगा।"
हरिशंकर जी ने धीमे स्वर में कहा, "बेटा, जीवन में बहुत देर हो जाने से पहले अपने रिश्तों को समय दे देना चाहिए। पैसा फिर कमाया जा सकता है, लेकिन बीता हुआ समय कभी वापस नहीं आता।"
अमित की आँखों से आँसू बहने लगे।
उसने कहा, "मुझे माफ कर दीजिए पापा। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई।"
हरिशंकर जी ने उसकी तरफ देखा, फिर दरवाजे के पास खड़ी रागिनी को इशारे से अपने पास बुलाया।
उन्होंने रागिनी का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा, "बेटी, तुमने मेरे जीवन के आखिरी सालों को फिर से खूबसूरत बना दिया। तुम्हारे कारण मुझे लगा कि मैं अब भी किसी के लिए जरूरी हूँ।"
रागिनी फूट-फूटकर रोने लगी।
उसने कहा, "अंकल जी, आप जल्दी ठीक हो जाइए। परी आपका इंतजार कर रही है। उसने आपके लिए एक चित्र बनाया है।"
हरिशंकर जी के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।
उन्होंने धीरे से कहा, "उसे कहना... उसका दादाजी उससे बहुत प्यार करता है।"
इसके बाद उन्होंने अमित की ओर देखा।
"बेटा, मेरी मेज की दराज में एक लिफाफा रखा है। उसमें मेरी वसीयत और कुछ कागजात हैं। उन्हें ध्यान से पढ़ना। और एक बात... रागिनी पर कभी कोई आरोप मत लगाना। उसने मुझसे कुछ नहीं लिया, बल्कि मुझे बहुत कुछ दिया है।"
अमित ने सिर झुकाकर कहा, "मैं वादा करता हूँ पापा।"
हरिशंकर जी ने आखिरी बार रागिनी का हाथ दबाया।
उनकी आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगीं।
कुछ ही क्षणों बाद डॉक्टर ने बाहर आकर बताया कि हरिशंकर जी अब इस दुनिया में नहीं रहे।
रागिनी वहीं कुर्सी पर बैठकर रोने लगी।
उसे ऐसा महसूस हो रहा था, जैसे उसने एक बार फिर अपने पिता को खो दिया हो।
अंतिम संस्कार के बाद अमित अपने पिता के घर पहुँचा। उसने मेज की दराज खोली और वहाँ रखा लिफाफा निकाल लिया।
उसमें एक पत्र भी था।
पत्र में लिखा था:
"मेरे बेटे अमित,
अगर तुम यह पत्र पढ़ रहे हो, तो समझ लेना कि मैं अब तुम्हारे बीच नहीं हूँ।
बेटा, मैंने तुम्हें बहुत प्यार से पाला। तुम्हारी हर जरूरत पूरी करने की कोशिश की। तुम्हारी पढ़ाई, तुम्हारी नौकरी और तुम्हारे परिवार के लिए मैंने अपनी खुशियों को पीछे रखा।
मुझे तुमसे कभी धन की उम्मीद नहीं थी। बस इतना चाहता था कि कभी बिना किसी काम के मेरे पास बैठ जाओ और पूछ लो कि पापा, आप कैसे हैं?
तुम्हारी व्यस्त जिंदगी में शायद मेरे लिए समय नहीं बचा।
लेकिन जब मैं बिल्कुल अकेला पड़ गया था, तब एक ऐसी लड़की मेरे जीवन में आई, जिसका मुझसे कोई खून का रिश्ता नहीं था।
उसने मेरी दवाइयों का ध्यान रखा, मेरी पसंद का खाना बनाया, मेरी पुरानी बातें सुनीं और मेरी उदासी में मेरे साथ बैठी।
वह चाहती तो मुझसे दूर रह सकती थी, लेकिन उसने मुझे कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया।
उसका नाम रागिनी है।
मैंने अपनी कानूनी वसीयत में अपनी संपत्ति का एक हिस्सा जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए निर्धारित किया है। मेरी बाकी संपत्ति का बँटवारा भी कानूनी रूप से स्पष्ट कर दिया है। मेरी इच्छा है कि मेरे पुराने घर के एक हिस्से में एक छोटा पुस्तकालय और बच्चों के लिए निःशुल्क पढ़ाई की व्यवस्था की जाए।
इस काम को शुरू करने की जिम्मेदारी मैं रागिनी और तुम दोनों को सौंपना चाहता हूँ।
बेटा, याद रखना, किसी की सेवा करने वाला इंसान कभी छोटा नहीं होता।
और हाँ, रागिनी को कभी पराया मत समझना। वह मेरे लिए बेटी थी और हमेशा रहेगी।
तुम्हारा पिता,
हरिशंकर।"
पत्र पढ़ते-पढ़ते अमित की आँखें भर आईं।
उसने पहली बार महसूस किया कि उसके पिता को जीवन में कितनी अकेलापन भरी तकलीफों से गुजरना पड़ा था।
तभी उसकी पत्नी ने पूछा, "क्या लिखा है पिताजी ने?"
अमित ने आँसू पोंछते हुए कहा, "उन्होंने मुझे मेरी सबसे बड़ी गलती का एहसास करा दिया। जिस पिता ने मेरे लिए पूरी जिंदगी लगा दी, मैं उनके लिए थोड़ा-सा समय भी नहीं निकाल पाया।"
उसकी पत्नी भी चुपचाप रोने लगी।
अगले दिन अमित रागिनी के घर पहुँचा।
रागिनी ने दरवाजा खोला तो अमित की आँखें झुकी हुई थीं।
उसने हाथ जोड़कर कहा, "रागिनी जी, मुझे माफ कर दीजिए। मैंने आपके बारे में गलत सोचा। मुझे लगा था कि आप पिताजी की संपत्ति के लिए उनकी सेवा कर रही हैं। लेकिन अब समझ आया कि मैं खुद अपने पिता के प्यार की कीमत नहीं समझ पाया।"
रागिनी ने शांत स्वर में कहा, "भैया, आप मुझसे माफी मत माँगिए। अंकल जी हमेशा चाहते थे कि आप उनके करीब रहें। उनकी सबसे बड़ी इच्छा यही थी कि परिवार फिर से एक-दूसरे के साथ जुड़े।"
अमित की आँखों से आँसू बह निकले।
उसने कहा, "मैं उनकी यह इच्छा जरूर पूरी करूँगा।"
कुछ महीनों बाद हरिशंकर जी के पुराने घर का रूप बदलने लगा।
घर के एक हिस्से में छोटी-सी लाइब्रेरी बनाई गई। दूसरे कमरे में गरीब बच्चों को निःशुल्क पढ़ाने की व्यवस्था की गई।
दरवाजे पर एक सुंदर-सा बोर्ड लगाया गया।
हरिशंकर स्मृति पुस्तकालय एवं शिक्षा केंद्र
उसके नीचे छोटे अक्षरों में लिखा था—
"ज्ञान बाँटने वाला कभी अकेला नहीं मरता, उसके विचार हमेशा जीवित रहते हैं।"
उद्घाटन के दिन अमित अपने परिवार के साथ वहाँ पहुँचा। रागिनी भी अपनी बेटी परी के साथ मौजूद थी।
परी ने पुस्तकालय में रखी एक किताब उठाई और मासूमियत से पूछा, "मम्मी, क्या दादाजी भी यहाँ आएँगे?"
रागिनी की आँखें भर आईं।
उसने परी को गले लगाकर कहा, "हाँ बेटा, जब भी कोई बच्चा यहाँ किताब पढ़ेगा, जब भी कोई बच्चा कुछ नया सीखेगा, तब तुम्हारे दादाजी यहीं होंगे।"
अमित ने यह सुना तो वह खुद को रोक नहीं पाया।
वह रागिनी के पास आया और बोला, "दीदी, पिताजी ने आपको बेटी माना था। अगर आप अनुमति दें, तो मैं भी आपको अपनी बड़ी बहन मानना चाहता हूँ।"
रागिनी ने भावुक होकर उसके सिर पर हाथ रखा।
"रिश्ते माँगने से नहीं, निभाने से बनते हैं अमित भैया। आइए, हम सब मिलकर उनकी यादों को जिंदा रखें।"
उस दिन पुस्तकालय में कई बच्चों को किताबें बाँटी गईं। हरिशंकर जी की तस्वीर के सामने फूल रखे गए और उनके जीवन की अच्छी बातें बच्चों को सुनाई गईं।
रागिनी अब भी उस घर में जाती है। जब भी किसी बच्चे को किताब पढ़ते देखती है, तो उसे लगता है कि हरिशंकर जी कहीं आसपास ही बैठे मुस्कुरा रहे हैं।
उसने अपने जीवन का वह खालीपन भी भर लिया था, जिसकी वजह वह वर्षों तक समझ नहीं पाई थी।
अब उसे पता था कि जीवन का असली उद्देश्य सिर्फ अपने लिए खुशियाँ इकट्ठा करना नहीं, बल्कि किसी दूसरे के जीवन में खुशियों की वजह बनना भी है।
कहानी की सीख:
रिश्ते केवल खून से नहीं बनते, उन्हें प्रेम, विश्वास और समय देकर भी बनाया जा सकता है। माता-पिता को जीवनभर अपने बच्चों से बहुत उम्मीदें नहीं होतीं। उन्हें बस इतना चाहिए कि उनके बच्चे कभी उनके पास बैठें, उनकी बातें सुनें और उन्हें यह एहसास दिलाएँ कि वे आज भी उनके जीवन में महत्वपूर्ण हैं।
क्योंकि जब बुज़ुर्गों को सबसे ज्यादा अपनों की जरूरत होती है, तब उन्हें अकेला छोड़ देना किसी भी धन-दौलत से बड़ी कमी है।

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