जब परिवार ने थामा बहू का हाथ
"निखिल, मैं आपसे कुछ कहना चाहती हूँ। मैं अब नौकरी करना चाहती हूँ। घर की जिम्मेदारियां निभाते-निभाते ऐसा लगता है जैसे मेरी अपनी सारी इच्छाएं कहीं पीछे छूट गई हैं। मैं भी चाहती हूँ कि मेरी अपनी एक पहचान हो, लोग मुझे सिर्फ आपकी पत्नी या किसी की बहू के नाम से नहीं, बल्कि मेरे काम से जानें।"
नाश्ते की मेज पर चाय का कप रखते हुए रागिनी ने अपने पति निखिल से कहा।
निखिल ने अखबार एक तरफ रखते हुए उसकी ओर देखा और मुस्कुराकर पूछा, "अचानक नौकरी करने का ख्याल कैसे आ गया? घर में ऐसी कोई परेशानी है क्या, जिसके कारण तुम्हें नौकरी करनी पड़ रही है?"
रागिनी ने तुरंत जवाब दिया, "नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। आपने मुझे कभी किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने दी। लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि मैं अपने सारे सपने भूल जाऊं। शादी से पहले मैंने भी नौकरी करने के सपने देखे थे। पढ़ाई पूरी होने के बाद सोचा था कि अपने पैरों पर खड़ी होऊंगी, लेकिन शादी और परिवार की जिम्मेदारियों में सब कुछ पीछे छूट गया। अब मैं फिर से शुरुआत करना चाहती हूँ।"
निखिल ने उसकी बात ध्यान से सुनी और फिर कहा, "अगर तुम्हारी खुशी इसी में है तो मुझे कोई परेशानी नहीं है। तुम नौकरी की तलाश शुरू करो। तुम्हें मेरी मदद की जरूरत पड़े तो बेझिझक बताना।"
रागिनी के चेहरे पर खुशी फैल गई।
वह जानती थी कि निखिल उसका साथ देगा, लेकिन फिर भी उसके मन में एक डर था कि कहीं ससुराल वाले उसकी इस इच्छा को गलत न समझ लें।
उसकी सास सविता देवी भी वहीं बैठी थीं। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "बहू, अपने सपने पूरे करने की उम्र कभी खत्म नहीं होती। तुम नौकरी करो, घर के कामों की चिंता मत करना। हम सब मिलकर संभाल लेंगे।"
सास की बात सुनकर रागिनी का मन हल्का हो गया।
उसने उसी दिन अपने पुराने प्रमाणपत्र निकाले और नौकरी की तलाश शुरू कर दी।
कई दिनों तक वह अलग-अलग कंपनियों में आवेदन करती रही। कहीं अनुभव मांगा जाता तो कहीं वेतन बहुत कम मिलता। कई जगह तो इंटरव्यू देने के बाद भी कोई जवाब नहीं आता।
एक दिन निराश होकर घर लौटी तो निखिल ने पूछा, "क्या हुआ? आज भी नौकरी नहीं मिली?"
रागिनी ने थके हुए स्वर में कहा, "हर जगह अनुभव मांगते हैं। अब इतने साल घर में रहने के बाद कौन मुझे मौका देगा?"
निखिल ने समझाते हुए कहा, "हिम्मत मत हारो। पहली नौकरी मिलने में समय लगता है। कोशिश जारी रखो, तुम्हें जरूर मौका मिलेगा।"
आखिरकार उसकी मेहनत रंग लाई। एक निजी कंपनी में उसे नौकरी मिल गई। वेतन भी अच्छा था और काम भी उसकी पढ़ाई के अनुसार था।
नौकरी का पहला दिन रागिनी के लिए किसी त्योहार से कम नहीं था। उसने अपनी पसंद की साड़ी पहनी, बाल संवारे और आईने में खुद को देखकर मुस्कुराई।
सविता देवी ने उसे देखकर कहा, "बहू, आज तो तुम बिल्कुल नई दुल्हन जैसी लग रही हो। भगवान तुम्हें खूब तरक्की दे।"
रागिनी ने उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया और खुशी-खुशी ऑफिस चली गई।
शुरुआत के कुछ दिन बहुत अच्छे बीते। नए लोगों से मिलना, नई चीजें सीखना और अपने काम की तारीफ सुनना उसे बहुत अच्छा लगता था।
पहली तनख्वाह मिलने पर उसने निखिल के लिए एक सुंदर घड़ी खरीदी और सास के लिए उनकी पसंद की रेशमी साड़ी।
घर पहुंचकर उसने दोनों को तोहफे दिए।
निखिल ने घड़ी देखकर मजाक में कहा, "वाह! अब तो घर में मेरी जेब से ज्यादा तुम्हारी जेब चलने लगी है।"
रागिनी हंसते हुए बोली, "आपकी कमाई अपनी जगह है और मेरी कमाई अपनी जगह। लेकिन अपनी पहली तनख्वाह से आपको कुछ देना मेरा सपना था।"
सविता देवी ने बहू को गले लगाते हुए कहा, "खुश रहो बेटा। तुम्हारी खुशी ही हमारी खुशी है।"
लेकिन कुछ ही समय बाद रागिनी को समझ आने लगा कि नौकरी करना जितना आसान उसने सोचा था, असल में उतना आसान नहीं था।
घर और ऑफिस दोनों को संभालना उसके लिए बड़ी चुनौती बन गया।
वह सुबह जल्दी उठकर निखिल का नाश्ता और टिफिन तैयार करती, फिर घर के बाकी काम निपटाती और तैयार होकर ऑफिस चली जाती। ऑफिस में कभी मीटिंग होती तो कभी अचानक काम बढ़ जाता। शाम को घर लौटते-लौटते काफी देर हो जाती।
घर पहुंचने के बाद भी उसे आराम नहीं मिलता। कभी रात का खाना बनाना होता तो कभी अगले दिन की तैयारी करनी पड़ती।
धीरे-धीरे उसके चेहरे की चमक कम होने लगी।
एक दिन निखिल ने उससे पूछा, "रागिनी, तुम पिछले कुछ दिनों से बहुत थकी हुई लग रही हो। क्या ऑफिस में काम ज्यादा है?"
रागिनी ने मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा, "कुछ खास नहीं। बस काम थोड़ा बढ़ गया है। सब ठीक हो जाएगा।"
निखिल ने कहा, "अगर तुम्हें परेशानी हो रही है तो मुझे बताओ। घर के काम हम दोनों मिलकर कर लेंगे।"
रागिनी ने बात टालते हुए कहा, "आप पहले ही ऑफिस से थककर आते हैं। मैं सब संभाल लूंगी।"
लेकिन वह खुद भी जानती थी कि अब उसके लिए सब कुछ अकेले संभालना मुश्किल होता जा रहा है।
एक दिन ऑफिस में उसकी सहकर्मी पूजा ने उसे चुपचाप बैठे देखा तो पूछा, "रागिनी, क्या बात है? आज तुम बहुत परेशान लग रही हो।"
रागिनी ने कहा, "समझ नहीं आता कि नौकरी और घर के बीच तालमेल कैसे बैठाऊं। ऑफिस का काम खत्म होता है तो घर की जिम्मेदारियां इंतजार कर रही होती हैं। कभी लगता है नौकरी छोड़ दूं और कभी अपने सपनों के बारे में सोचकर रुक जाती हूँ।"
पूजा ने उसे समझाते हुए कहा, "देखो, नौकरी करना तुम्हारा फैसला था और अपने सपने पूरे करना तुम्हारा अधिकार है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि घर की सारी जिम्मेदारी भी तुम्हारी ही हो। अपने परिवार से बात करो।"
रागिनी ने उसकी बात सुनी, लेकिन घर में इस बारे में बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई।
उसे डर था कि कहीं कोई यह न समझे कि वह घर की जिम्मेदारियों से भाग रही है।
एक दिन ऐसी घटना हुई जिसने उसके मन में चल रही सारी परेशानियों को बाहर ला दिया।
उस दिन ऑफिस में एक महत्वपूर्ण प्रस्तुति होनी थी। रागिनी ने कई दिनों से इसकी तैयारी की थी। उसे उम्मीद थी कि अगर उसकी प्रस्तुति अच्छी रही तो उसे पदोन्नति मिल सकती है।
लेकिन घर से निकलने से कुछ देर पहले सविता देवी की तबीयत अचानक खराब हो गई।
रागिनी ने घबराकर निखिल को फोन किया।
"निखिल, माँ जी की तबीयत ठीक नहीं लग रही। उन्हें चक्कर आ रहे हैं और कमजोरी भी महसूस हो रही है। मैं उन्हें अस्पताल लेकर जा रही हूँ।"
निखिल ने तुरंत कहा, "तुम बिल्कुल चिंता मत करो। मैं भी ऑफिस से निकलने की कोशिश करता हूँ। माँ का ध्यान रखना।"
रागिनी सास को लेकर अस्पताल पहुंची। डॉक्टर ने जांच के बाद बताया कि घबराने की कोई बात नहीं है, लेकिन उन्हें कुछ दिनों तक आराम और नियमित दवाइयों की जरूरत होगी।
सविता देवी ने बहू का हाथ पकड़कर कहा, "बेटा, मेरी वजह से तुम्हारी नौकरी का नुकसान हो गया। तुम ऑफिस चली जातीं तो अच्छा होता।"
रागिनी ने प्यार से जवाब दिया, "माँ जी, आप भी कैसी बातें कर रही हैं? आपकी तबीयत से ज्यादा जरूरी मेरे लिए कुछ नहीं है।"
लेकिन अगले दिन ऑफिस पहुंचने पर उसकी परेशानी और बढ़ गई।
मैनेजर ने उसे अपने केबिन में बुलाकर कहा, "रागिनी, आपका काम अच्छा है, लेकिन पिछले कुछ दिनों से आप समय पर काम पूरा नहीं कर पा रही हैं। कल की प्रस्तुति भी छूट गई। हमें उम्मीद है कि आप आगे से अपनी जिम्मेदारियों को बेहतर तरीके से संभालेंगी।"
रागिनी ने सिर झुकाकर कहा, "जी सर, मैं पूरी कोशिश करूंगी कि आगे से ऐसी स्थिति न आए।"
वह केबिन से बाहर निकली तो उसकी आंखें नम थीं।
जिस नौकरी को पाने के लिए उसने इतनी मेहनत की थी, अब उसी नौकरी को बचाए रखने के लिए उसे हर दिन संघर्ष करना पड़ रहा था।
घर लौटकर उसने अपना बैग सोफे पर रखा और बिना कुछ बोले कमरे में जाकर बैठ गई।
निखिल ने उसके चेहरे की उदासी देखकर पूछा, "क्या हुआ रागिनी? आज फिर ऑफिस में कुछ हुआ है?"
रागिनी खुद को रोक नहीं पाई।
उसने रोते हुए कहा, "निखिल, मुझसे नहीं हो रहा है। मैं थक गई हूँ। ऑफिस में लगता है कि घर की जिम्मेदारियां ठीक से नहीं निभा रही और घर में रहती हूँ तो ऑफिस का काम अधूरा रह जाता है। हर समय किसी न किसी बात का डर लगा रहता है। अब तो ठीक से नींद भी नहीं आती।"
निखिल उसके पास बैठ गया और प्यार से उसका हाथ पकड़कर बोला, "तुमने मुझसे पहले क्यों नहीं बताया? क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारे सारे सपनों की जिम्मेदारी सिर्फ तुम्हारी है?"
रागिनी ने आंसू पोंछते हुए कहा, "मैंने सोचा था कि नौकरी मिलने के बाद सब कुछ अच्छा हो जाएगा। लेकिन अब लगता है कि मैंने अपनी अच्छी-खासी जिंदगी में बेवजह परेशानियां बढ़ा ली हैं। मुझे फिर से अपनी वही पुरानी जिंदगी चाहिए। कम से कम तब मैं अपने परिवार को समय तो दे पाती थी।"
तभी कमरे के दरवाजे पर खड़ी सविता देवी अंदर आ गईं।
उन्होंने रागिनी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "बहू, तुम एक बात समझने की कोशिश करो। घर संभालना भी काम है और ऑफिस जाना भी काम है। लेकिन घर के काम सिर्फ तुम्हारे नहीं हैं। हम सबकी जिम्मेदारी है।"
रागिनी ने धीरे से कहा, "माँ जी, लेकिन आप भी तो अब पहले जैसी स्वस्थ नहीं रहतीं। मैं आपको परेशान नहीं करना चाहती।"
सविता देवी ने प्यार से जवाब दिया, "बेटा, मां होने का मतलब सिर्फ बहू से सेवा करवाना नहीं होता। जब घर का कोई सदस्य परेशानी में हो तो दूसरे सदस्यों को उसका सहारा बनना चाहिए। तुमने इतने साल इस घर को संभाला है। अब हमारी बारी है।"
निखिल ने भी उसका हाथ थामकर कहा, "और मैं भी अब से घर की जिम्मेदारियों में बराबर का हिस्सा लूंगा। तुम्हारी नौकरी सिर्फ तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं है। तुम्हारी खुशी भी मेरे लिए उतनी ही जरूरी है जितनी मेरी अपनी खुशी।"
रागिनी ने आश्चर्य से पूछा, "लेकिन आप अपने ऑफिस के काम के साथ घर कैसे संभालेंगे?"
निखिल मुस्कुराकर बोला, "जैसे तुम इतने साल संभालती आई हो। अब थोड़ा अनुभव मुझे भी हो जाने दो।"
सविता देवी हंसते हुए बोलीं, "और मैं भी अभी इतनी बूढ़ी नहीं हुई कि घर में बैठकर सिर्फ आराम करती रहूं। सब्जियां काटने और रसोई के छोटे-मोटे काम करने में मुझे कोई परेशानी नहीं है।"
तीनों की बातें सुनकर रागिनी के चेहरे पर मुस्कान लौट आई।
अगले दिन से घर की व्यवस्था बदल गई। निखिल सुबह नाश्ता तैयार करने में मदद करने लगा। सविता देवी घर के छोटे-मोटे काम संभालने लगीं और रागिनी ऑफिस से लौटकर सिर्फ जरूरी काम करती।
रविवार को तीनों मिलकर पूरे सप्ताह की तैयारी कर लेते। इससे रागिनी को भी आराम मिलने लगा और घर में पहले जैसी खुशियां लौट आईं।
कुछ महीनों बाद कंपनी में एक महत्वपूर्ण पद के लिए कर्मचारियों का चयन होना था। रागिनी ने पूरी मेहनत और आत्मविश्वास के साथ अपना काम प्रस्तुत किया।
इस बार उसकी प्रस्तुति सभी को बहुत पसंद आई।
मैनेजर ने उसे केबिन में बुलाकर कहा, "रागिनी, आपकी मेहनत और काम के प्रति लगन देखकर हमें खुशी है। कंपनी ने आपको वरिष्ठ पद पर पदोन्नत करने का फैसला किया है। बधाई हो!"
यह सुनकर रागिनी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
घर पहुंचते ही उसने मिठाई का डिब्बा निखिल और सविता देवी के सामने रख दिया।
निखिल ने हैरानी से पूछा, "आज कौन-सी खुशी है? कहीं फिर से मेरी जेब पर हमला करने का इरादा तो नहीं है?"
रागिनी हंसते हुए बोली, "इस बार मेरी पदोन्नति हुई है।"
निखिल ने खुशी से उसे गले लगा लिया और कहा, "मुझे तुम पर गर्व है। तुमने आखिरकार अपना सपना पूरा कर ही लिया।"
सविता देवी ने मिठाई खिलाते हुए कहा, "बहू, आज तुम्हारी मेहनत सफल हुई है। लेकिन मुझे सबसे ज्यादा खुशी इस बात की है कि तुमने मुश्किल समय में हार नहीं मानी।"
रागिनी की आंखों में आंसू आ गए।
उसने सास का हाथ पकड़कर कहा, "माँ जी, अगर उस दिन आप और निखिल मेरा साथ नहीं देते तो शायद मैं नौकरी छोड़ चुकी होती। मुझे लगता था कि परिवार और अपने सपनों में से किसी एक को चुनना पड़ेगा, लेकिन आपने मुझे सिखाया कि दोनों साथ चल सकते हैं।"
निखिल ने मुस्कुराकर कहा, "एक बात बताऊं? अब तुम्हारी तनख्वाह बढ़ गई है, इसलिए अगली बार परिवार को बाहर खाना खिलाने की जिम्मेदारी तुम्हारी।"
रागिनी ने हंसते हुए जवाब दिया, "बिल्कुल! लेकिन खाना खिलाने की जिम्मेदारी मेरी और बिल बांटने की जिम्मेदारी आपकी।"
सविता देवी भी उनकी बातें सुनकर हंसने लगीं।
उस दिन रागिनी ने महसूस किया कि जिंदगी में अपनी पहचान बनाना बहुत जरूरी है, लेकिन उस पहचान को खूबसूरत बनाने के लिए परिवार का साथ भी उतना ही जरूरी है।
सीख: किसी महिला का घर संभालना उसकी जिम्मेदारी हो सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसके अपने सपने और इच्छाएं महत्वहीन हैं। परिवार तभी खुशहाल बनता है जब घर की जिम्मेदारियां मिलकर निभाई जाएं और हर सदस्य को अपनी पहचान बनाने का पूरा अवसर मिले। एक अच्छा जीवनसाथी वह नहीं जो केवल सपने देखने की अनुमति दे, बल्कि वह है जो उन सपनों को पूरा करने में बराबर का साथ निभाए।

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