शाम के लगभग साढ़े आठ बज रहे थे। बस से उतरते समय सीमा के पैरों में जैसे जान ही नहीं बची थी। दिनभर खड़ी रहकर काम करना, फिर लोकल ट्रेन की धक्का...Read More
सुबह के ठीक चार बजे थे। पूरा घर गहरी नींद में डूबा हुआ था, लेकिन कमला देवी की नींद बरसों पहले ही उनसे रूठ चुकी थी। रसोई में जलती एक छोटी-सी ...Read More
सुबह के ठीक साढ़े सात बजे थे। रसोई में प्रेशर कुकर की सीटी गूँज रही थी और ड्रॉइंग रूम में स्कूल बैग खुला पड़ा था। नेहा एक हाथ से चाय छान रही...Read More
दोपहर के ढाई बजे थे। ऑफिस में सन्नाटा पसरा हुआ था। एसी की ठंडी हवा में भी अरुण के माथे पर हल्की सिलवटें थीं। कंप्यूटर स्क्रीन पर एक्सेल शीट ...Read More