रात के लगभग ग्यारह बजे थे। घर की लाइटें जल रही थीं, लेकिन माहौल बुझा-बुझा था। दरवाज़ा ज़ोर से खुला। “ये क्या तरीका है, काव्या?” पापा की आवाज...Read More
सुबह का समय था। घर के आँगन में हल्की धूप उतर आई थी। दरवाज़े के पास आम के पत्तों की तोरण झूल रही थी और ज़मीन पर रंगोली अब भी ताज़ी लग रही थी।...Read More
सुबह के पाँच बजे थे। रसोई में चूल्हा जल चुका था और कढ़ाही में घी पिघल रहा था। स्मिता की आँखें आधी खुली थीं, लेकिन हाथ अपने आप चल रहे थे— जैस...Read More
नेहा ने जैसे ही ससुराल की रसोई में कदम रखा, उसे पहली ही बात समझ आ गई थी— यहाँ चूल्हा सिर्फ नाम का था। किचन में माइक्रोवेव था, एयर फ्रायर था,...Read More
सरोज देवी को कमर में हमेशा दर्द रहता था। दर्द ऐसा कि सुबह उठते ही पहले हाथ दीवार पर टिकता, फिर ज़मीन पर पाँव पड़ता। डॉक्टर ने साफ कह दिया था...Read More
शादी का घर था। ढोलक की थाप चल रही थी, और आँगन में लोग ऐसे घूम रहे थे जैसे सबके पास कोई न कोई ज़िम्मेदारी हो— सिवाय मेरे। मैं कुर्सी पर बैठा ...Read More