दोपहर का समय था। घर के आँगन में धूप हल्की-हल्की फैल रही थी। शंकरलाल जी अपनी पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर बैठे अख़बार पढ़ रहे थे। उम्र ढल चुकी थ...Read More
गांव के एक छोटे से घर में शारदा अपने परिवार के साथ रहती थी। उसके पति रमेश एक छोटी सी नौकरी करते थे। घर में एक बेटा अर्जुन और दो बेटियां रीमा...Read More
रात के करीब साढ़े बारह बजे थे। कमरे में पंखा चल रहा था, फिर भी महेश बाबू को नींद नहीं आ रही थी। वे बार-बार करवट बदल रहे थे। “क्या हुआ? नींद ...Read More
रात के लगभग ग्यारह बजे थे। घर की लाइटें जल रही थीं, लेकिन माहौल बुझा-बुझा था। दरवाज़ा ज़ोर से खुला। “ये क्या तरीका है, काव्या?” पापा की आवाज...Read More
सुबह का समय था। घर के आँगन में हल्की धूप उतर आई थी। दरवाज़े के पास आम के पत्तों की तोरण झूल रही थी और ज़मीन पर रंगोली अब भी ताज़ी लग रही थी।...Read More
सुबह के पाँच बजे थे। रसोई में चूल्हा जल चुका था और कढ़ाही में घी पिघल रहा था। स्मिता की आँखें आधी खुली थीं, लेकिन हाथ अपने आप चल रहे थे— जैस...Read More